बिहार की राजनीति में एक दिलचस्प और लंबे समय से चली आ रही परंपरा फिर चर्चा में है। यह परंपरा कहती है कि राज्य में उपमुख्यमंत्री (डिप्टी सीएम) का पद संभालने वाला नेता शायद ही कभी मुख्यमंत्री (सीएम) की कुर्सी तक पहुंच पाता है। अपवाद के तौर पर सिर्फ कर्पूरी ठाकुर का नाम लिया जाता है, जिन्होंने इस बाधा को पार किया था। अब एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह 67 साल पुराना ‘सूखा’ खत्म होने वाला है?
राजनीतिक गलियारों में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा सम्राट चौधरी को लेकर हो रही है। मौजूदा हालात और सियासी समीकरणों को देखते हुए उनके मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं पर बहस तेज हो गई है। अगर ऐसा होता है, तो वह बिहार के राजनीतिक इतिहास में एक नई मिसाल कायम कर सकते हैं।
विश्लेषकों की मानें तो बिहार में सत्ता का केंद्र हमेशा मुख्यमंत्री के इर्द-गिर्द ही रहा है। उपमुख्यमंत्री का पद अक्सर राजनीतिक संतुलन बनाने और जातीय समीकरण साधने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। इस पद को भविष्य के नेतृत्व की सीढ़ी के रूप में कम ही देखा गया है। यही वजह है कि डिप्टी सीएम से सीएम बनने का रास्ता अब तक मुश्किल साबित हुआ है।
इसके अलावा, बिहार की राजनीति में गठबंधन सरकारों का भी बड़ा प्रभाव रहा है। यहां अलग-अलग दलों के बीच समझौते और समीकरण इतने जटिल होते हैं कि मुख्यमंत्री का चयन अक्सर पार्टी नेतृत्व और केंद्रीय रणनीति के आधार पर तय होता है, न कि केवल राज्य के भीतर के पदानुक्रम से।
तेजस्वी यादव जैसे बड़े नेता भी डिप्टी सीएम रह चुके हैं, लेकिन वे भी अब तक इस परंपरा को नहीं तोड़ पाए हैं। ऐसे में सम्राट चौधरी के सामने न केवल राजनीतिक चुनौती है, बल्कि एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड को बदलने का अवसर भी है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि आने वाले दिनों में बिहार की सियासत किस करवट बैठती है और क्या यह पुरानी परंपरा टूट पाती है या नहीं।






