अर्थव्यवस्था पर पश्चिम एशिया संकट का असर बताने की मांग, मनीष तिवारी का सरकार पर सवाल

Share

नई दिल्ली: कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने पश्चिम एशिया में सैन्य संघर्ष के कारण उत्पन्न हुईं तमाम प्रकार की चुनौतियों के मद्देनजर सरकार के राजस्व अनुमानों, बजट की बुनियाद और देश की आर्थिक स्थिरता पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि बजट जिन अनुमानों पर आधारित था, वे खाड़ी क्षेत्र में युद्ध और तेल की कीमतों में भारी वृद्धि के बाद अब पूरी तरह शिथिल हो चुके हैं। देश एक मई के बाद एक नई आर्थिक वास्तविकता का सामना करेगा और सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि इस संकट का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर कितना पड़ेगा।

तिवारी ने लोकसभा में मंगलवार को वित्त विधेयक 2026 पर चर्चा के दौरान कहा कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पश्चिम एशिया में सैन्य संघर्ष का असर तेल, एलएनजी, खाद्यान्न और दवाइयों की कीमतों पर कितना पड़ेगा। 30 अप्रैल तक सरकार चुनावों के कारण स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश करेगी, लेकिन एक मई के बाद देश एक नई आर्थिक वास्तविकता का सामना करेगा।

कांग्रेस सदस्य तिवारी ने कहा कि फरवरी 2026 में भारतीय बास्केट का कच्चे तेल का भाव 70 डॉलर प्रति बैरल था, जो मार्च में बढ़कर 119 डॉलर से अधिक हो गया। भारत वर्ष 2012-13 और 2013-14 में लगभग 77 फीसदी कच्चा तेल आयात करता था। जो वित्त वर्ष 2025-26 तक यह बढ़कर 88 फीसदी हो गया। इसी तरह भारत का एलएनजी आयात 2013-14 में लगभग 29-30 फीसदी था, जो 2025-26 में बढ़कर 45-47 फीसदी तक पहुंच गया है। तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर की वृद्धि से भारत के राजस्व पर 10 से 15 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। भारत हर साल 150 से 200 अरब डॉलर कच्चे तेल के आयात पर खर्च करता है।

उन्होंने कहा कि बजट और वित्त विधेयक एक फरवरी 2026 को पेश किया गया था, लेकिन 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर हमले के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ा है। यह असर भारत के लिए बेहद संवेदनशील है और बजट के आधारभूत अनुमान अब वैध नहीं रह गए हैं। वर्ष 2013-14 में भारत का कुल कर्ज 56.51 लाख करोड़ रुपये था, जो 2026 में बढ़कर 214.8 लाख करोड़ रुपये हो गया है। केंद्र और राज्यों का सम्मिलित ऋण-से-जीडीपी अनुपात 84.2 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जबकि एफआरबीएम अधिनियम में इसे 60 प्रतिशत तक सीमित रखने का प्रावधान था। इतनी अधिक उधारी निजी निवेश को पूरी तरह बाहर कर देती है और कंपनियों को ऊंचे ब्याज दरों पर वित्त जुटाना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि सरकार ने टैक्स संग्रह में 13 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया था, लेकिन यह सिर्फ 3 प्रतिशत ही बढ़ा। कॉर्पोरेट टैक्स का अनुमान 9 प्रतिशत था, जबकि वृद्धि 7 प्रतिशत रही। आयकर का अनुमान 17 प्रतिशत था, लेकिन यह केवल 6 प्रतिशत बढ़ा। वहीं अप्रत्यक्ष करों में 13 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान था, लेकिन यह -1 प्रतिशत घट गया। कर लचीलापन (टैक्स ब्वॉयेंसी) घटने से सरकार को बाजार से 17 लाख करोड़ रुपये का कर्ज उठाना पड़ा।

तिवारी ने कहा कि 2019-20 में कॉर्पोरेट टैक्स दरों में भारी कटौती की गई और आज प्रभावी कॉर्पोरेट टैक्स दर केवल 18.85 प्रतिशत है। इसके बावजूद निजी निवेश ठप है और भारतीय अर्थव्यवस्था सार्वजनिक पूंजीगत व्यय पर निर्भर हो गई है, जो अब 17.14 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। सरकार निजी क्षेत्र को इतनी रियायतें देने के बावजूद निवेश क्यों नहीं बढ़ा पा रही है।

उन्होंने कहा कि 2014 में रुपया 60.99 प्रति डॉलर था, जो अब बढ़कर 93.34 प्रति डॉलर हो गया है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश भारत से बाहर जा रहे हैं। सितंबर से दिसंबर 2025 तक एफडीआई नकारात्मक रहा है और इसका सीधा असर रुपये की मजबूती पर पड़ा है। कैपिटल अकाउंट बैलेंस जीडीपी के प्रतिशत के रूप में -6 प्रतिशत है और नाममात्र प्रभावी विनिमय दर -7 प्रतिशत है।

Share this article

Facebook
Twitter X
WhatsApp
Telegram
 
March 2026
M T W T F S S
 1
2345678
9101112131415
16171819202122
23242526272829
3031