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बिहार के मंत्री दीपक प्रकाश की कुर्सी पर संकट, नियुक्ति पर उठे सवाल, मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

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पटना, 08 जून: बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की दोबारा नियुक्ति को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, जहां एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर उनकी नियुक्ति की वैधता पर सवाल उठाए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका

याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने अपनी याचिका में कहा है कि दीपक प्रकाश राज्य विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं, ऐसे में उनका मंत्री पद पर बने रहना संविधान के प्रावधानों के खिलाफ है।

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आर्टिकल 164(4) का हवाला

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 164(4) का हवाला देते हुए कहा गया है कि कोई भी गैर-विधायक अधिकतम 6 महीने तक मंत्री रह सकता है। इस अवधि के भीतर उसे किसी सदन का सदस्य बनना अनिवार्य होता है। याचिकाकर्ता का दावा है कि इस प्रावधान का बार-बार उपयोग नहीं किया जा सकता।

दोबारा नियुक्ति पर सवाल

दीपक प्रकाश को पहली बार 20 नवंबर 2025 को मंत्री बनाया गया था, तब भी वे किसी सदन के सदस्य नहीं थे। बाद में सरकार में बदलाव के बाद 7 मई 2026 को उन्हें फिर से मंत्री पद की शपथ दिलाई गई। इसी पुनर्नियुक्ति को लेकर विवाद खड़ा हुआ है।

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बढ़ी राजनीतिक मुश्किलें

मामला ऐसे समय में सामने आया है जब एमएलसी चुनाव के लिए उन्हें टिकट भी नहीं मिला है। एनडीए द्वारा जारी उम्मीदवारों की सूची में उनका नाम शामिल नहीं है, जिससे उनके मंत्री पद पर संकट और गहरा गया है।

इस्तीफे की अटकलें

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि दीपक प्रकाश को विधायक बनाने के लिए उनकी मां स्नेहलता अपने पद से इस्तीफा दे सकती हैं, ताकि उपचुनाव के जरिए उन्हें सदन में भेजा जा सके। हालांकि इस पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

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किसे मिला टिकट

एमएलसी चुनाव के लिए बीजेपी ने पवन सिंह, संजय मयूख, अनिल कुमार ठाकुर और शीला पंडित को उम्मीदवार बनाया है। वहीं जदयू ने निशांत कुमार, भारती मेहता, शिवरानी प्रजापति और ललन प्रसाद को मैदान में उतारा है। आरजेडी ने सुनील सिंह को उम्मीदवार बनाया है।

कानूनी और राजनीतिक महत्व

विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला संवैधानिक प्रावधानों, लोकतांत्रिक जवाबदेही और मंत्री पद की पात्रता से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने वाले समय में ऐसे मामलों के लिए मिसाल बन सकता है।

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