रांची: झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET)-2026 को लेकर राज्य में भाषा को लेकर चल रही बहस के बीच कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने स्थानीय और जनजातीय भाषाओं को प्राथमिकता देने की वकालत की है। उन्होंने भाषा समिति के समक्ष अपने सुझाव रखते हुए कहा कि JTET केवल एक प्रतियोगी परीक्षा नहीं, बल्कि शिक्षकों की योग्यता सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
‘भाषा शिक्षण का आधार’
मंत्री ने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि शिक्षा का मूल आधार है। शिक्षक तभी प्रभावी ढंग से पढ़ा सकते हैं, जब वे बच्चों की भाषाई, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझें।
क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाओं पर जोर
शिल्पी नेहा तिर्की ने झारखंड की 5 प्रमुख जनजातीय भाषाओं—
- कुड़ुख
- मुंडारी
- संथाली
- खड़िया
- हो
और 4 क्षेत्रीय भाषाओं—
- खोरठा
- कुरमाली
- नागपुरी
- पंचपरगनिया
को शिक्षा व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बताते हुए इन्हें JTET में प्राथमिकता देने की बात कही।
‘भाषाई न्याय’ की वकालत
उन्होंने कहा कि जिन भाषाओं में विद्यार्थी पढ़ते हैं, उन्हीं भाषाओं में शिक्षकों की पात्रता परीक्षा होना अधिक न्यायसंगत और प्रभावी होगा। इससे शिक्षा प्रणाली स्थानीय जरूरतों के अनुरूप बनेगी।
बाहरी भाषाओं को शामिल करने पर आपत्ति
मंत्री ने स्पष्ट किया कि भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसी भाषाओं को JTET में शामिल करना राज्यहित में नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि झारखंड का गठन स्थानीय पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए हुआ था, ऐसे में अन्य राज्यों की भाषाओं को आधार बनाना उचित नहीं होगा।
2023 के गजट के आधार पर नीति की मांग
उन्होंने मांग की कि JTET की भाषा नीति 13 मार्च 2023 को जारी राजपत्र (संख्या 147/148) के आधार पर तय की जाए, ताकि स्पष्टता बनी रहे।
कमिटी पुनर्गठित, विवाद सुलझाने की कोशिश
भाषा विवाद को सुलझाने के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पहले पांच मंत्रियों की कमिटी बनाई थी। बाद में प्रतिनिधित्व के मुद्दे उठने पर शिल्पी नेहा तिर्की और हफीजुल हसन अंसारी को शामिल कर कमिटी का पुनर्गठन किया गया।
JTET में भाषा को लेकर लिया गया निर्णय झारखंड की शिक्षा व्यवस्था और स्थानीय युवाओं के रोजगार पर सीधा असर डालेगा। ऐसे में सरकार के सामने संतुलित और न्यायसंगत नीति बनाने की बड़ी चुनौती है।






