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भागलपुर स्मार्ट सिटी में 3.40 करोड़ का ई-टॉयलेट घोटाला, ठेकेदार रिशु श्री पर जांच एजेंसियों का शिकंजा

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भागलपुर: भागलपुर स्मार्ट सिटी परियोजना में कथित तौर पर करोड़ों रुपये के ई-टॉयलेट घोटाले का मामला सामने आया है। इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग और टेंडर अनियमितताओं में पहले से जांच के दायरे में आए ठेकेदार रिशु श्री की कंपनी पर अब शिकंजा कसता जा रहा है।

3.40 करोड़ की लागत, 25 ई-टॉयलेट

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत शहर में 25 ई-टॉयलेट यूनिट लगाने का ठेका रिशु श्री की कंपनी रिलायबल इंटरप्राइजेज-रिलायबल इंफ्रा सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया था। इस परियोजना की कुल लागत लगभग 3.40 करोड़ रुपये बताई गई।

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इस हिसाब से एक ई-टॉयलेट की लागत 13 लाख रुपये से अधिक बैठती है, जिस पर अब सवाल उठ रहे हैं।

कुछ ही दिनों में हो गए बेकार

परियोजना के तहत लगाए गए ई-टॉयलेट कुछ ही दिनों में खराब होकर कबाड़ में तब्दील हो गए। रखरखाव की कमी और तकनीकी खामियों के कारण यह महत्वाकांक्षी योजना असफल साबित हुई।

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बकाया राशि जब्त, ठेका रद्द

करीब 3.40 करोड़ रुपये की परियोजना में लगभग 50 लाख रुपये का भुगतान लंबित था, जिसे स्मार्ट सिटी बोर्ड ने जब्त कर लिया है।

इसके साथ ही कंपनी का अनुबंध (एकरारनामा) भी रद्द कर दिया गया है। अधिकारियों के अनुसार, कई बार नोटिस देने के बावजूद कंपनी ने ई-टॉयलेट का रखरखाव नहीं किया।

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प्राथमिकी दर्ज

इस मामले में 9 फरवरी को इशाकचक थाने में रिशु श्री के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। जांच एजेंसियां पूरे मामले की पड़ताल कर रही हैं।

प्रमुख स्थानों पर लगाए गए थे ई-टॉयलेट

शहर के कई प्रमुख स्थानों पर ये ई-टॉयलेट लगाए गए थे, जिनमें शामिल हैं:

  • लाजपत पार्क
  • तिलकामांझी
  • कचहरी चौक
  • घंटाघर
  • कोतवाली चौक
  • आदमपुर चौक
  • रेलवे स्टेशन
  • बस स्टैंड

कुल 12 स्थानों पर 25 यूनिट स्थापित किए गए थे।

आधुनिक सुविधाओं का किया गया था दावा

परियोजना में ऑटोमैटिक दरवाजे, सेंसर आधारित फ्लशिंग सिस्टम, ऑटो क्लीनिंग तकनीक और स्मार्ट वाटर मीटर जैसी आधुनिक सुविधाओं का दावा किया गया था।

लेकिन जमीनी हकीकत में ये सुविधाएं टिक नहीं सकीं और योजना विफल हो गई।

अधिकारियों की भूमिका पर सवाल

परियोजना के दौरान तत्कालीन नगर आयुक्त डॉ. योगेश सागर की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। मामले की गहन जांच में और खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।

यह मामला स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में पारदर्शिता और निगरानी की कमी को उजागर करता है। यदि समय रहते जवाबदेही तय नहीं की गई, तो इस तरह की योजनाएं जनता के पैसे की बर्बादी बनती रहेंगी।

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