बिहार सरकार बच्चों के भारी स्कूल बैग पर सख्त, नए नियमों से छात्रों को मिलेगा तनावमुक्त और सुरक्षित शिक्षण वातावरण

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पटना : बिहार सरकार ने स्कूली बच्चों के भारी बैग की समस्या को गंभीरता से लेते हुए बड़ा फैसला लिया है। शिक्षा विभाग ने राज्य के सभी सरकारी सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों को एनसीईआरटी की “स्कूल बैग पॉलिसी 2026” का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया है। सरकार का मानना है कि लगातार भारी स्कूल बैग ढोने से बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। इसी को देखते हुए अब स्कूलों में बच्चों के बैग की नियमित जांच की जाएगी और तय मानकों से अधिक वजन पाए जाने पर कार्रवाई भी होगी।

नई गाइडलाइन के अनुसार अब किसी भी छात्र का स्कूल बैग उसके शरीर के कुल वजन के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। उदाहरण के तौर पर यदि किसी बच्चे का वजन 30 किलो है तो उसके बैग का वजन अधिकतम 3 किलो तक ही होना चाहिए। सरकार ने साफ कहा है कि बच्चों को रोजाना जरूरत से ज्यादा किताबें और कॉपियां ढोने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

शिक्षा विभाग ने सभी स्कूलों को परिसर में वजन मापने वाली मशीन लगाने का निर्देश दिया है। इसके जरिए समय-समय पर बच्चों और उनके बैग का वजन मापा जाएगा। खास तौर पर कक्षा 1 से 5 तक के बच्चों के बैग की हर तीन महीने में रैंडम जांच की जाएगी। यदि किसी बच्चे का बैग तय सीमा से ज्यादा भारी पाया जाता है, तो इसकी जानकारी अभिभावकों को दी जाएगी और संबंधित छात्र के बैग की अगले कुछ दिनों तक विशेष निगरानी की जाएगी।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि छोटे बच्चों पर पढ़ाई का अनावश्यक बोझ नहीं डाला जाना चाहिए। इसी वजह से प्रारंभिक कक्षाओं के छात्रों को होमवर्क देने पर भी रोक लगाने की बात कही गई है। शिक्षा विभाग का कहना है कि कम उम्र के बच्चों को ज्यादा होमवर्क और भारी बैग के दबाव में रखने से उनका मानसिक विकास प्रभावित होता है।

शिक्षा मंत्री ने कहा कि स्कूलों को ऐसा टाइम टेबल तैयार करना होगा, जिससे बच्चों को रोज सभी किताबें लेकर स्कूल आने की जरूरत न पड़े। जिन विषयों की पढ़ाई जिस दिन हो, केवल उसी विषय की किताब और कॉपी लाने की व्यवस्था बनाई जाए। इससे बच्चों के बैग का वजन स्वतः कम हो जाएगा।

सरकार ने स्कूलों को लॉकर सुविधा उपलब्ध कराने की भी सलाह दी है, ताकि छात्र अपनी कुछ किताबें और अन्य जरूरी सामग्री स्कूल में ही रख सकें। इसके साथ ही साफ पेयजल, खेल-कूद और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं को भी मजबूत करने का निर्देश दिया गया है। शिक्षा विभाग का कहना है कि केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि बच्चों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही जरूरी है।

नई नीति के तहत खेल, कला, संगीत और शारीरिक शिक्षा को भी पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार पढ़ाई और परीक्षा के दबाव के कारण बच्चों में तनाव बढ़ रहा है। ऐसे में खेल और रचनात्मक गतिविधियां उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाने में मदद करेंगी।

सरकार ने निजी स्कूलों को भी चेतावनी दी है कि यदि वे नियमों का पालन नहीं करेंगे तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। शिक्षा विभाग के अनुसार कई निजी स्कूलों में बच्चों को जरूरत से ज्यादा किताबें और कॉपियां खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, जिससे अभिभावकों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ता है। अब सरकार इस पर निगरानी रखेगी।

विशेषज्ञों के मुताबिक भारी स्कूल बैग बच्चों की रीढ़ की हड्डी, कंधों और गर्दन पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। लंबे समय तक ज्यादा वजन ढोने से कम उम्र में ही पीठ दर्द, झुकाव और अन्य शारीरिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। डॉक्टरों ने भी समय-समय पर स्कूल बैग का वजन कम करने की सलाह दी है।

अभिभावकों ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है। कई माता-पिता का कहना है कि छोटे बच्चे रोज भारी बैग लेकर स्कूल जाते हैं, जिससे उन्हें काफी परेशानी होती है। खासकर प्राथमिक कक्षाओं के छात्रों के लिए यह समस्या ज्यादा गंभीर थी। अब नए नियम लागू होने से बच्चों को राहत मिलने की उम्मीद है।

शिक्षा विभाग का कहना है कि यह फैसला केवल नियम लागू करने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्कूलों में इसकी नियमित मॉनिटरिंग भी की जाएगी। जिला शिक्षा पदाधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे समय-समय पर स्कूलों का निरीक्षण करें और नियमों के पालन की रिपोर्ट तैयार करें।

सरकार का मानना है कि स्वस्थ और तनावमुक्त बच्चे ही बेहतर भविष्य की नींव रख सकते हैं। इसलिए शिक्षा व्यवस्था को केवल परीक्षा और अंक तक सीमित रखने के बजाय बच्चों के संपूर्ण विकास पर ध्यान देना जरूरी है। नई स्कूल बैग नीति को इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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