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छत्तीसगढ़ का बत्तीसा मंदिर: अद्भुत शिल्पकला और प्राचीन विज्ञान का अनूठा संगम

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पत्थरों में उकेरी इतिहास की जीवंत गाथा, 32 स्तंभों पर टिका है बारसूर का ऐतिहासिक मंदिर

बस्तर/रायपुर, 06 मई )। बत्तीसा मंदिर भारतीय स्थापत्य कला, आध्यात्मिक आस्था और प्राचीन इतिहास का अद्भुत उदाहरण है। बारसूर में स्थित यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि प्राचीन शिल्पकला और वैज्ञानिक निर्माण तकनीक का भी जीवंत प्रमाण माना जाता है।

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कभी नागवंशी शासकों की राजधानी रहे बारसूर को आज भी “मंदिरों की नगरी” के रूप में जाना जाता है।

32 विशाल स्तंभों पर टिका मंदिर

इतिहासकारों के अनुसार बत्तीसा मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में नागवंशी शासक सोमेश्वर देव के काल में हुआ था। शिलालेखों के मुताबिक इसका निर्माण शक संवत 1130 यानी लगभग 1209 ईस्वी में पूरा हुआ।

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मंदिर का नाम “बत्तीसा” इसलिए पड़ा क्योंकि इसकी पूरी संरचना 32 विशाल पत्थर के स्तंभों पर आधारित है। ये स्तंभ आठ पंक्तियों में संतुलित ढंग से स्थापित किए गए हैं, जो उस समय की वास्तुकला और इंजीनियरिंग कौशल को दर्शाते हैं।

बिना चूना-गारा के निर्माण

मंदिर की सबसे खास विशेषता यह है कि इसके निर्माण में पत्थरों को बिना चूना-गारा के जोड़ा गया है। प्रत्येक स्तंभ पर देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं और अलंकरणों की बारीक नक्काशी की गई है।

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मंदिर की संरचना चतुर्भुजाकार है और इसमें दो गर्भगृह बनाए गए हैं, जहां अलग-अलग शिवलिंग स्थापित हैं। मान्यता है कि यहां राजा और रानी अलग-अलग पूजा-अर्चना करते थे।

घूमने वाला शिवलिंग बना आकर्षण

मंदिर परिसर में स्थापित नंदी बैल की प्रतिमा श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि नंदी के कान में मनोकामना कहने से वह पूरी होती है।

गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग अपनी विशेष संरचना के कारण बेहद रोचक माना जाता है। कहा जाता है कि यह शिवलिंग एक विशेष यांत्रिक प्रणाली पर आधारित है, जो जल प्रवाह के प्रभाव से बिना घर्षण और बिना ध्वनि के घूम सकता है। इसे प्राचीन भारतीय विज्ञान और तकनीकी समझ का अद्भुत उदाहरण माना जाता है।

इतिहास और पौराणिक मान्यताओं का संगम

शिलालेखों से पता चलता है कि मंदिर के रखरखाव के लिए केरामरूका गांव दान में दिया गया था। इस मंदिर के निर्माण में तत्कालीन मंत्री, सचिव और अन्य गणमान्य लोगों की भूमिका भी रही। वर्तमान में संबंधित शिलालेख नागपुर संग्रहालय में सुरक्षित है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बाणासुर ने इस क्षेत्र में अपनी राजधानी बसाई थी, जो आगे चलकर ऐतिहासिक बारसूर के रूप में विकसित हुई। यह क्षेत्र दंडकारण्य की प्राचीन सांस्कृतिक धारा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

गणेश प्रतिमा भी आकर्षण का केंद्र

बारसूर में स्थित मामा-भांजा मंदिर और चंद्रादित्य मंदिर के साथ बत्तीसा मंदिर बस्तर की समृद्ध विरासत को और मजबूत बनाता है। यहां स्थापित विश्व की तीसरी सबसे बड़ी गणेश प्रतिमा भी पर्यटकों और श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।

संरक्षण के लिए लगातार प्रयास

राज्य सरकार और पुरातत्व विभाग द्वारा इस धरोहर के संरक्षण के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2003 में मंदिर के पुनर्निर्माण और संरक्षण का कार्य किया गया, जिससे इसकी मूल संरचना और सौंदर्य को सुरक्षित रखा जा सका।

आज बत्तीसा मंदिर छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है। यह केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन कला, संस्कृति और इतिहास का जीवंत प्रतीक भी है।

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