नास्तिक विचारधारा वाली माकपा अब धार्मिक मंचों पर सक्रिय, विपक्ष ने बताया ‘मजबूरी की राजनीति’
(माकपा) का बदला हुआ राजनीतिक अंदाज पश्चिम बंगाल में चर्चा का विषय बन गया है। विधानसभा चुनाव 2026 से पहले पार्टी अब मंदिरों और धार्मिक आयोजनों के जरिए अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है।
क्या है पूरा मामला?
माकपा, जो लंबे समय तक ‘धर्म अफीम है’ की विचारधारा पर चलती रही, अब अपने नेताओं को खुले तौर पर धार्मिक गतिविधियों में भाग लेते हुए देख रही है। इसे पार्टी की रणनीतिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
मीनाक्षी मुखर्जी की तस्वीरें वायरल
माकपा की युवा नेता हाल के दिनों में मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हुए नजर आई हैं। उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं, जिससे राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
विपक्ष इसे ‘वोट बैंक की राजनीति’ बता रहा है।
पहले भी हो चुका है विवाद
दिवंगत माकपा नेता ने भी में पूजा की थी, जिस पर पार्टी के भीतर विवाद हुआ था। उस समय के नेतृत्व में वामपंथी विचारधारा ज्यादा सख्त मानी जाती थी।
मंदिर से चुनाव प्रचार की शुरुआत
पानीहाटी से माकपा उम्मीदवार ने में पूजा कर अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत की।
उन्होंने इसे सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ाव बताया, लेकिन राजनीतिक जानकार इसे रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं।
2021 की हार के बाद बदली रणनीति ।
में माकपा के खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। अब वह धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों के जरिए मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है।
विपक्ष का हमला : (भाजपा) और (टीएमसी) ने माकपा के इस बदलाव को ‘वैचारिक समझौता’ बताया है।
बंगाल की राजनीति में माकपा का यह नया ‘धार्मिक चेहरा’ चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। अब देखना होगा कि यह बदलाव पार्टी को फायदा पहुंचाता है या नहीं।





