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हरिवंश की राज्यसभा वापसी: राष्ट्रपति नामांकन से बदले सियासी समीकरण, अनुभव और संतुलन की राजनीति को मिला नया सहारा

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नई दिल्ली : वरिष्ठ पत्रकार और राजनेता हरिवंश नारायण सिंह एक बार फिर राज्यसभा पहुंचने जा रहे हैं। इस बार उन्हें उनकी पार्टी JDU ने टिकट नहीं दिया, लेकिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के तहत नामित कर उच्च सदन में भेज दिया। यह फैसला ऐसे समय आया है जब उनका कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को समाप्त हो चुका था और उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें तेज थीं।

दरअसल, संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति को 12 सदस्यों को राज्यसभा में नामित करने का अधिकार होता है। ये वे लोग होते हैं जिन्होंने साहित्य, पत्रकारिता, कला या सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया हो। हरिवंश इसी श्रेणी में आते हैं, क्योंकि उनका लंबा पत्रकारिता और संसदीय अनुभव रहा है।

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हरिवंश की वापसी इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि वे राज्यसभा के उपसभापति रह चुके हैं और सदन की कार्यवाही को संतुलित तरीके से चलाने के लिए जाने जाते हैं। 2018 में पहली बार इस पद पर पहुंचे और बाद में दोबारा भी चुने गए। उनका शांत, संवादात्मक और संतुलित रवैया सत्ता और विपक्ष दोनों के बीच स्वीकार्य रहा है।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह नामांकन कई संकेत देता है। पहला, केंद्र सरकार और सत्ता पक्ष उनके अनुभव को अभी भी उपयोगी मानता है। दूसरा, JDU द्वारा टिकट नहीं दिए जाने के बावजूद उनका संसद में बने रहना यह दर्शाता है कि वे सिर्फ पार्टी नेता नहीं, बल्कि एक संस्थागत चेहरा बन चुके हैं।

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तीसरा बड़ा पहलू गठबंधन राजनीति से जुड़ा है। हाल के वर्षों में बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच हरिवंश का संतुलित रुख उन्हें विभिन्न खेमों के बीच एक स्वीकार्य व्यक्ति बनाता है। नए संसद भवन के उद्घाटन जैसे कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति और प्रधानमंत्री की सराहना ने भी उनके प्रभाव को मजबूत किया है।

अंततः, हरिवंश की राज्यसभा में वापसी केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह संदेश भी है कि अनुभव, संसदीय मर्यादा और संतुलित नेतृत्व की राजनीति में आज भी बड़ी भूमिका है। उनकी मौजूदगी आने वाले समय में राज्यसभा की कार्यप्रणाली और राजनीतिक संवाद को प्रभावित कर सकती है।

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