भारत-नेपाल संबंधों में नया अध्याय, कानूनी मामलों में बढ़ेगा द्विपक्षीय सहयोग

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काठमांडू। नेपाल और भारत के बीच आपराधिक मामलों में पारस्परिक कानूनी सहायता से संबंधित समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं। पहली बार हुए इस समझौते से सीमापार अपराधों की संयुक्त जांच से लेकर एक-दूसरे देश से साक्ष्यों के आदान–प्रदान का मार्ग खुलेगा। यह समझौता बुधवार को कानून, न्याय तथा संसदीय मामिला मंत्रालय में हुआ।

इस समझौते पर नेपाल की ओर से कानून मंत्रालय के सह सचिव विनोदकुमार भट्टराई और भारत की ओर से नेपाल के लिए भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर कानून मंत्री अनिलकुमार सिन्हा, कानून सचिव पाराश्वर ढुंगाना, विदेश मंत्रालय के प्रतिनिधि तथा भारतीय दूतावास के कर्मचारी उपस्थित रहे।

कानून मंत्रालय के सचिव ढुंगाना के अनुसार, लंबे समय से भारत के साथ ऐसे समझौते पर चर्चा चल रही थी। अब इसे अंतिम रूप दिया गया है। उन्होंने कहा, “आपराधिक मामलों में दोनों देशों के बीच पारस्परिक कानूनी सहायता के आदान–प्रदान के उद्देश्य से यह समझौता किया गया है।

इस समझौते को पिछले वर्ष 17 अक्टूबर को प्रधानमंत्री सुशीला कार्की की अध्यक्षता में हुई मंत्रिपरिषद की बैठक से स्वीकृति मिली थी। ढुंगाना ने बताया कि इसमें साक्ष्यों के आदान–प्रदान के साथ-साथ सीमा-पार अपराधों की संयुक्त जांच का भी प्रावधान है। उन्होंने कहा, “ट्रांसनेशनल अपराधों में संयुक्त रूप से जांच करने की व्यवस्था भी की गई है। अपराध नियंत्रण में यह समझौता दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।” संवैधानिक प्रावधान के अनुसार, संसद को जानकारी दिए जाने के बाद ऐसे समझौते लागू होते हैं।

सचिव ढुंगाना के अनुसार, यह समझौता नेपाल में होने वाले वित्तीय अपराधों को कम करने तथा जांच, अभियोजन और न्यायिक निर्णय को अधिक प्रभावी बनाने में मील का पत्थर साबित होगा। मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि हाल के समय में बढ़े संगठित अपराध, मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादी गतिविधियों में वित्तीय निवेश के नियंत्रण तथा पारस्परिक मूल्यांकन में भी इससे सकारात्मक सहयोग मिलेगा।

समझौते के अनुसार, किसी अपराध से जुड़े मामलों में यदि किसी व्यक्ति को उपस्थित कराना संभव न हो, तो साक्ष्य, शपथपत्र और बयान दर्ज कराना, प्रमाण जुटाना, नोटिस तामील कराना तथा जांच के लिए अन्य सूचनाओं का आदान–प्रदान किया जाएगा। जांच के दायरे में आए किसी नेपाली नागरिक के भारत में वित्तीय लेन–देन की स्थिति में अब बैंक विवरण प्राप्त करना भी आसान होगा। अभी तक अपराध की जांच में सहयोग से संबंधित किसी ठोस समझौते या तंत्र के अभाव में दोनों देशों के कानून प्रवर्तन अधिकारियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता रहा है।

वर्ष 1953 में नेपाल और भारत के बीच प्रत्यर्पण संधि हुई थी। उसी संधि के तहत प्रक्रिया पूरी कर भारत में अपराध कर नेपाल आए सुच्चा सिंह को गिरफ्तार कर भारत को सौंपा गया था। पंजाब के मुख्यमंत्री सरदार प्रताप सिंह कैरों की हत्या कर नेपाल आए सुच्चा को 2 फरवरी 1966 को अदालत के निर्णय के बाद भारतीय सुरक्षा कर्मियों को प्रत्यर्पित किया गया था। कई विवादों के बाद, नेपाल में गिरफ्तारी के लगभग एक वर्ष बाद ही उनका प्रत्यर्पण संभव हो सका। बाद में कोई प्रत्यर्पण न होने के कारण वह संधि लगभग निष्क्रिय हो गई।

वर्ष 2003 में भी सचिव स्तरीय प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर हुए थे, लेकिन सरकार द्वारा अनुमोदन न मिलने के कारण वह लागू नहीं हो सकी। प्रत्यर्पण संधि के अभाव में दोनों देशों के बीच अनौपचारिक रूप से अभियुक्तों का आदान–प्रदान होता रहा है, जिससे अनावश्यक विवाद उत्पन्न होते रहे हैं।

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