‘बस्तर पंडुम-2026’ में सजी जनजातीय संस्कृति की झलक, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने किया सम्मान

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रायपुर। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने छत्तीसगढ़ के ‘बस्तर पंडुम-2026’ समारोह में यहां की माटी की सुगंध और आदिम जनजातीय परंपराओं पर आधारित प्रदर्शनी में लगे स्टॉलों को देखा। उन्होंने स्थानीय निवासियों और कारीगरों की प्रदर्शित कलाओं व उत्पादों की सराहना की।

जगदलपुर मुख्यालय पर ‘बस्तर पंडुम-2026’ समारोह के शुभारंभ में शामिल होने पहुंचीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज बस्तर की माटी की सुगंध और आदिम जनजातीय परंपराओं पर आधारित भव्य प्रदर्शनियों काे देखा। उन्होंने आदिवासी विरासत को संजोने और उसे पूरी दुनिया तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम बताया। उन्होंने एक-एक कर ढोकरा हस्तशिल्प कला, टेराकोटा, वुड कार्विंग, सीसल कला, बांस कला, लौह शिल्प, जनजातीय वेश-भूषा एवं आभूषण, तुम्बा कला, बस्तर की जनजातीय चित्रकला, स्थानीय व्यंजन तथा लोक चित्रों पर आधारित आकर्षक प्रदर्शनी की सराहना की।

बस्तर पंडुम आयोजन स्थल पर जनजातीय हस्तशिल्प आधारित प्रदर्शनी में ढोकरा कला से निर्मित सामग्रियों का विशेष प्रदर्शन किया गया। इस हस्तशिल्प में लॉस्ट वैक्स कास्टिंग तकनीक का उपयोग किया जाता है। यह भारत की प्राचीन जनजातीय धातु कला है, जिसमें प्रकृति, देवी-देवताओं और ग्रामीण जीवन की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। ढोकरा की प्रत्येक कृति पूर्णतः हस्तनिर्मित होती है। इसके निर्माण में समाड़ी मिट्टी, मोम वैक्स, तार, पीतल, गरम भट्टी एवं सफाई मशीन का उपयोग किया जाता है। स्थानीय टेराकोटा कला को दर्शाती मिट्टी से बनी आकृतियों का भी प्रदर्शन किया गया, जो लोक आस्था, ग्रामीण जीवन और पारंपरिक विश्वासों को सजीव रूप में प्रस्तुत करती हैं।

प्रदर्शनी में लकड़ी की नक्काशी कला के माध्यम से सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं की जीवंत अभिव्यक्ति देखने को मिली। लकड़ी की मूर्तियां बनाने के लिए सागौन, बीजा, सिवनर एवं साल लकड़ी का उपयोग किया जाता है, जिसमें कारीगर पारंपरिक औजारों से बारीक आकृतियां उकेरते हैं। इसी तरह सीसल कला से बने जूट के कपड़े और अन्य हस्तशिल्पों का भी राष्ट्रपति ने अवलोकन किया। एक अन्य स्टॉल में बांस से बनी पारंपरिक उपयोगी और सजावटी वस्तुओं का प्रदर्शन किया गया। गढ़े हुए लोहे की कला से निर्मित कलाकृतियों ने भी राष्ट्रपति को विशेष रूप से आकर्षित किया।

जनजातीय आभूषणों को प्रदर्शित करने वाले स्टॉल ने राष्ट्रपति का विशेष ध्यान खींचा। इस स्टॉल में चांदी, मोती, शंख और विभिन्न धातुओं से हाथ से बनाए गए जनजातीय आभूषण प्रदर्शित किए गए हैं। ये आभूषण आदिवासी समुदायों की पहचान, सामाजिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं।

तुम्बा कला के अंतर्गत सूखी लौकी जैसी फली से बनाए गए पारंपरिक वाद्य यंत्र एवं सजावटी वस्तुएं भी प्रदर्शनी में रखी गई थीं। जनजातीय वेशभूषा एवं आभूषण स्टॉल में बस्तर क्षेत्र की प्रमुख जनजातियां—दंडामी माढ़िया, अबूझमाड़िया, मुरिया, भतरा एवं हल्बा की पारंपरिक वेशभूषा और आभूषण संबंधित जनजातियों के युवक-युवतियों द्वारा प्रदर्शित किए गए।

बस्तर पंडुम स्थल पर जनजातीय चित्रकला से जुड़ी जीवंत प्रदर्शनी का भी राष्ट्रपति मुर्मु ने अवलोकन किया। इस प्रदर्शनी में बस्तर की चित्रकला के माध्यम से आदिवासी जीवन, प्रकृति और परंपराओं की सजीव झलक प्रस्तुत की गई। बस्तर की कला में जंगल, लोक देवता, पर्व-त्योहार और दैनिक जीवन को सहज रंगों और प्रतीकों के माध्यम से उकेरा जाता है। यह चित्रकला पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम है।

स्थानीय व्यंजन स्टॉल में जनजातीय दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली खाद्य सामग्री एवं पेय पदार्थों का प्रदर्शन किया गया। इसमें जोंधरी लाई के लड्डू, जोंधरा, मंडिया पेज, आमट, चापड़ा चटनी, भेंडा चटनी, कुलथी दाल, पान बोबो, तीखुर जैसे पारंपरिक व्यंजनों के साथ पेय पदार्थ लांदा और सल्फी को प्रदर्शित किया गया।

लोक जीवन से संबंधित लोकचित्रों की प्रदर्शनी में बस्तर की संस्कृति और इतिहास, प्राकृतिक सौंदर्य, लोकजीवन एवं लोक परंपराओं से जुड़ी तस्वीरों के साथ-साथ बस्तर के जनजातीय समाज और लोक संस्कृति से संबंधित साहित्य भी प्रदर्शित किया गया।

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