दरभंगा राजघराने की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का निधन, पूरे मिथिला क्षेत्र में शोक की लहर

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मधुबनी। दरभंगा राज परिवार की महारानी कामसुंदरी देवी का निधन 96 साल की उम्र में सोमवार को हो गया। सोमवार को उन्होंने अपने राज परिसर स्थित कल्याणी निवास में अंतिम सांस ली।

महरानी की मौत से मिथिला में शोक की लहर

महरानी के निधन की खबर फैलते ही दरभंगा सहित पूरे मिथिला क्षेत्र में गहरा शोक छा गया है। मिथिला की सांस्कृतिक और राजसी परंपरा की एक जीवंत कड़ी के रूप में जानी जाने वाली महारानी के जाने से एक युग का अंत माना जा रहा ।

महारानी कामसुंदरी देवी दरभंगा के प्रसिद्ध महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी और अंतिम पत्नी थीं। दोनों की शादी 1940 के दशक में हुयी थी।महाराजा कामेश्वर सिंह की पहली दो पत्नियां महारानी राजलक्ष्मी और महारानी कामेश्वरी प्रिया पहले ही इस दुनिया से विदा ले चुकी थीं। ऐसे विरासत में कामसुंदरी देवी राज परिवार की वरिष्ठ सदस्य थीं।यह राजघराना बिहार के मिथिला क्षेत्र में लगभग 8380 किलोमीटर में फ़ैला हुआ था।

सामाजिक सेवा और परोपकार की प्रतीक

महारानी कामसुंदरी देवी सामाजिक और परोपकारी कामों के लिए जानी जाती थीं। उन्होंने अपने पति महाराजा कामेश्वर सिंह की स्मृति में “महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन” की स्थापना की थी। इस फाउंडेशन के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा से जुड़े कई कार्य किए जाते रहे हैं।आज भी इस संस्थान में दुर्लभ ग्रंथ उपलब्ध हैं।

स्थापना का इतिहास
फाउंडेशन की नींव 16 मार्च 1989 को पड़ी, जब महारानी कामसुंदरी देवी ने ट्रस्ट डीड नंबर 5699 पर हस्ताक्षर किए। यह उनके निवास पर हुआ। बता दें कि महाराजा कामेश्वर सिंह दरभंगा रियासत के अंतिम शासक थे और एक उदार व्यक्तित्व थे। उनकी कोई संतान नहीं थी, इसलिए महारानी ने उनकी विरासत को जीवित रखने के लिए यह कदम उठाया। फाउंडेशन खांडवाला वंश की परंपराओं से प्रेरित है जो मुगल काल से चली आ रही है। संस्थापक महामहोपाध्याय महेश ठाकुर की विचारधारा को आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया। महारानी ने अपनी सारी संपत्ति और संग्रह दान कर दिया, ताकि मिथिला की संस्कृति बची रहे।

इमरजेंसी में दरभंगा महाराज की संपत्तियों को सरकार ने ले लिया

महाराज कामेश्वर सिंह ने दोनों रानियों को रहने के लिए दरभंगा में एक-एक महल और महीने के पांच-पांच हजार रुपए मिलेंगे। इस तरह का नियम बनाया था। दोनों रानियों के निधन के बाद संपत्ति भतीजों की हो जाएगी। साथ ही संपत्ति का एक-तिहाई हिस्सा लोकहित के लिए रहेगा। कामेश्वर सिंह जो इस तरह के मामलों के अच्छे जानकार थे, उन्होंने लंदन के लॉएड्स बैंक को चिट्ठी लिखी थी कि वह उनकी 1958 की वसीयत को सुरक्षित रखा जाय।

पारिवारिक सेटलमेंट के तहत संपत्ति छोटी रानी और उनके भतीजों के बीच बांटी गई। अब एक-तिहाई के बदले एक-चौथाई संपत्ति लोकहित के लिए छोड़ी गई थी।

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