रांची, 22 सितंबर । करम पर्व के उल्लास में मंगलवार को पूरा झारखंड रंगा नजर आया। राजधानी रांची सहित राज्यभर में करम डाली, पारंपरिक वेशभूषा और लाल पाड़ साड़ियों से सजे अखड़े आकर्षण का केंद्र बने रहे। शाम होते ही पूजा-अनुष्ठान शुरू हुआ और देर रात तक मांदर, ढोलक और नगाड़ों की थाप पर श्रद्धालु करम गीतों पर झूमते रहे।
करम पर्व के अवसर पर भाई-बहनों ने अखड़ों की आकर्षक सजावट और विद्युत सज्जा की। बहनों ने उपवास रखकर विधि-विधान से करम देवता की पूजा की। वहीं भाई करम डाल काटकर नाचते-गाते हुए उसे अखड़ा तक लेकर पहुंचे। वहां बहनों ने गीत और नृत्य के साथ उनका स्वागत किया। पाहन के माध्यम से करम देवता को अखड़ा में स्थापित किया गया और इसके बाद जावा रखा गया।
पाहनों ने कराई पूजा, सुनाई करम-धरम की कथा
विभिन्न अखड़ों में पाहनों ने विधिवत पूजा-अर्चना कराई और श्रद्धालुओं को करम-धरम की कथा सुनाई। पूजा के बाद प्रसाद और जावा फूल का वितरण किया गया।
पूजा-अनुष्ठान के बाद श्रद्धालुओं ने अखड़ा की परिक्रमा की। मांदर, ढोलक और नगाड़ों की थाप के बीच करम गीतों पर देर रात तक नृत्य चलता रहा। पारंपरिक वेशभूषा में सजे महिला-पुरुष और बच्चों की मौजूदगी से अखड़े जीवंत नजर आए। चारों ओर पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज सुनाई देती रही।

प्रकृति और कृषि से गहराई से जुड़ा है करम पर्व
जगलाल पाहन ने बताया कि करम पर्व प्रकृति और कृषि से गहराई से जुड़ा हुआ है। पर्व की शुरुआत जावा उठाने की परंपरा से होती है। आदिवासी बहनें नदी या तालाब से बालू लाकर उसमें मक्का, जौ, धान, तीसी, उड़द सहित आठ-नौ प्रकार के अनाज के बीज डालती हैं। इसके बाद उपवास रखकर जावा उठाया जाता है।
उन्होंने बताया कि इसी दिन से कई लोग सादा भोजन ग्रहण करते हैं। अखड़ा में जावा को जगाने और उसकी देखभाल करने की परंपरा भी निभाई जाती है। जावा को अन्न और अच्छी फसल का प्रतीक माना जाता है। इसकी पूजा और देखभाल के माध्यम से बेहतर कृषि उपज की कामना की जाती है। पौधों के उगने के बाद उन्हें पड़ोसियों के बीच बांटने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में रही है।

भाइयों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना
करम पूजा के दौरान बहनों ने अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख और समृद्धि की कामना की। कई क्षेत्रों में भाइयों की कलाई पर करम डोर बांधने की परंपरा भी देखने को मिली। पूजा के बाद जावा को प्रसाद के रूप में वितरित किया गया। महिलाओं ने जावा को अपने बालों में भी लगाया।
कर्मा-धर्मा की कथा में प्रकृति और अच्छे कर्म का संदेश
करम पूजा के दौरान कर्मा-धर्मा की कथा सुनाने की परंपरा है। लोककथा के अनुसार कर्मा और धर्मा दो भाई थे। कर्मा मेहनत और कर्म को महत्व देता था, जबकि धर्मा पूजा-पाठ और धार्मिक आचरण में विश्वास रखता था।
कथा के अनुसार, कर्मा के परदेश से लौटने पर उसने घर और गांव के लोगों को करम वृक्ष के नीचे पूजा और नाच-गाने में व्यस्त देखा। अपने स्वागत नहीं होने से वह नाराज हो गया और क्रोध में करम डाली को उखाड़कर नदी में फेंक दिया।
इसके बाद उसके परिवार पर संकट आने लगा। धन-संपत्ति खत्म हो गई और जीवन कठिनाइयों से भर गया। अपनी गलती का एहसास होने पर कर्मा करम देवता की खोज में निकल पड़ा। उसे करम डाली वापस मिली। उसने क्षमा मांगी और करम डाली को सम्मानपूर्वक स्थापित कर पूजा की। इसके बाद उसके जीवन में फिर सुख-समृद्धि लौट आई।

इस लोककथा का मूल संदेश प्रकृति के सम्मान, अच्छे कर्म और अपनी भूल को स्वीकार करने से जुड़ा माना जाता है। इसी वजह से करम की रात सिर्फ पूजा-अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि लोककथाओं के जरिए नई पीढ़ी को परंपरा और जीवन-मूल्यों से भी जोड़ा जाता है।
सात भाइयों और करम रानी की कथा भी प्रचलित
करम पर्व से जुड़ी एक अन्य लोककथा सात भाइयों और करम रानी की भी है। कथा के अनुसार सात भाई खेती करते थे। एक दिन उनकी पत्नियां खेत में खाना पहुंचाने के बजाय करम पूजा और नृत्य में शामिल हो गईं। भूखे भाई घर लौटे और गुस्से में करम डाली को उखाड़कर नदी में बहा दिया।
इसके बाद परिवार पर संकट आने लगा। जब भाइयों को अपनी गलती का एहसास हुआ तो उन्होंने करम देवता को फिर स्थापित किया और विधि-विधान से पूजा की। इसके बाद उनके जीवन में खुशहाली लौट आई।
अलग-अलग क्षेत्रों में इस लोककथा के पात्रों और स्वरूप में अंतर देखने को मिलता है, लेकिन प्रकृति के सम्मान और अच्छे कर्म का संदेश लगभग समान रहता है।

अखड़ा बना सामुदायिक एकजुटता का केंद्र
झारखंड में करमा पर्व का एक प्रमुख पक्ष भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ा है। बहनें भाइयों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। इसके साथ ही यह पर्व कृषि और प्रकृति से भी गहराई से जुड़ा है। जावा में उगाए गए अनाज, करम वृक्ष की पूजा और अच्छी फसल की कामना ग्रामीण जीवन और प्रकृति के बीच गहरे संबंध को दर्शाती है।

गांवों में करमा पर्व का मुख्य केंद्र अखड़ा होता है, जहां पूरा समुदाय एक साथ जुटता है। पूजा के बाद गीत और नृत्य का दौर शुरू होता है। अब शहरों में भी सामुदायिक मैदानों, मोहल्लों और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से करम पर्व की परंपरा को आगे बढ़ाया जा रहा है। मंगलवार को भी राज्यभर में अखड़ों में देर रात तक उत्सव का माहौल बना रहा।






