काठमांडू, 02 सितंबर । नेपाल के रसुवागढ़ी में विनाशकारी बाढ़ के पीछे माने जा रहे ग्लेशियर कोलैप्स की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि करीब 2.5 करोड़ घन मीटर बर्फ और हिमखंड लगभग 2,000 मीटर नीचे आकर गिरे। विशेषज्ञों के अनुसार, इतनी बड़ी मात्रा में बर्फ के अचानक नीचे गिरने से भारी ऊर्जा पैदा हुई, जिसका प्रभाव बम विस्फोट जैसा रहा होगा। इस घटना से उत्पन्न कंपन को 5.2 रिक्टर स्केल के भूकंप के रूप में भी दर्ज किया गया।
बर्फ के गिरने से पैदा हुई भारी ऊर्जा
लांगटांग लेरुंग के उत्तर में हिमस्खलन और बाढ़ का अध्ययन कर रहे त्रिभुवन विश्वविद्यालय के भूगर्भशास्त्र केंद्रीय विभाग के प्रोफेसर डॉ. रंजन कुमार दाहाल के अनुसार, बर्फ का विशाल ढेर महज नीचे नहीं गिरा, बल्कि इसके साथ आसपास के क्षेत्र में व्यापक क्षति पहुंचाने वाली अत्यधिक ऊर्जा भी उत्पन्न हुई।
डॉ. दाहाल ने बताया कि सैटेलाइट डेटा के विश्लेषण और बेहद कम अनुमान के आधार पर भी करीब 2.5 करोड़ घन मीटर बर्फ के नीचे गिरने की पुष्टि होती है। लगभग 2,000 मीटर की ऊंचाई से नीचे गिरने के दौरान इस बर्फीले ढेर से उत्पन्न ऊर्जा का प्रभाव बम विस्फोट जैसा रहा होगा।
1.3 किलोमीटर लंबा था हिमस्खलन
प्रोफेसर दाहाल के अनुसार, उपलब्ध सैटेलाइट डेटा के विश्लेषण से पता चलता है कि हिमस्खलन की लंबाई करीब 1.3 किलोमीटर थी। नीचे की ओर बढ़ते हुए इसने करीब 500 से 800 मीटर क्षेत्र को अपनी चपेट में लेते हुए पूरी तरह साफ कर दिया।
वैज्ञानिक अभी तक बर्फ के ढेर की वास्तविक मोटाई स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं कर पाए हैं। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि नीचे गिरे बर्फीले मलबे की मोटाई करीब 60 से 70 मीटर रही होगी।
4 करोड़ घन मीटर तक सामग्री गिरने का अनुमान
बर्फ की मोटाई और प्रभावित क्षेत्र के आधार पर किए गए आकलन में करीब 4 करोड़ घन मीटर सामग्री के नीचे गिरने की संभावना सामने आई है। हालांकि, प्रोफेसर दाहाल बेहद कम अनुमान के आधार पर भी कम से कम 2.5 करोड़ घन मीटर बर्फ के गिरने की बात कह रहे हैं।
वहीं, कुछ अन्य विशेषज्ञों ने शुरुआती आकलन में यह मात्रा 10 करोड़ घन मीटर तक होने की संभावना जताई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बर्फ की वास्तविक मात्रा का पता विस्तृत अध्ययन और आगे मिलने वाले सैटेलाइट आंकड़ों के विश्लेषण के बाद ही चल सकेगा।
एक साल से हिमालयी गतिविधियों का अध्ययन
त्रिभुवन विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग भूगर्भविद् डॉ. दाहाल के साथ चीन के शंघाई स्थित टोंगजी विश्वविद्यालय, ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और किंग्स कॉलेज लंदन तथा इटली के पादुआ विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ करीब एक वर्ष से हिमालय और हिमाली क्षेत्रों में हो रही गतिविधियों का अध्ययन कर रहे थे।
अध्ययन के दौरान सामने आया था कि रसुवागढ़ी के ऊपरी तिब्बती क्षेत्र में स्थित प्यूरेपु हिमताल के सुप्राग्लेशियल लेक यानी ग्लेशियर की सतह पर हाल में बने छोटे-छोटे जलकुंड और तालाब फट गए थे। इसके कारण पिछले वर्ष भी भोटेकोशी नदी में बाढ़ आने की जानकारी सामने आई थी।
इसके बाद वैज्ञानिकों की टीम ने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों की हलचल और उनसे जुड़ी गतिविधियों पर निगरानी और अध्ययन तेज किया। इसी अध्ययन के दौरान पिछले बुधवार अचानक विनाशकारी बाढ़ आ गई, जिसके बाद टीम के कुछ सदस्य मौके पर हिमस्खलन और बाढ़ के कारणों का अध्ययन करने में जुट गए।
वेम्बली स्टेडियम को 22 बार भर सकती है इतनी बर्फ
2.5 करोड़ घन मीटर बर्फ की विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इतनी मात्रा से लंदन के वेम्बली स्टेडियम को करीब 22 बार भरा जा सकता है। यह मात्रा मिस्र के प्रसिद्ध पिरामिड के आयतन से करीब 10 गुना अधिक बताई जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ये आंकड़े अभी शुरुआती वैज्ञानिक आकलन पर आधारित हैं। बर्फ के आयतन और ग्लेशियर की वास्तविक स्थिति का विस्तृत अध्ययन पूरा होने के बाद ही इस आपदा की भयावहता और इसके पीछे मौजूद भूगर्भीय कारणों की अधिक स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकेगी।






