नई दिल्ली, 23 जुलाई। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव तथा पश्चिम एशिया से कच्चे तेल की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। गुरुवार को ब्रेंट क्रूड लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड भी 91 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ने 1.16 डॉलर प्रति बैरल की बढ़त के साथ 95.23 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार की शुरुआत की। शुरुआती कारोबार में इसकी कीमत बढ़कर 99.99 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो पिछले दो महीनों का सर्वोच्च स्तर है। भारतीय समयानुसार शाम 6:30 बजे ब्रेंट क्रूड 5.64 डॉलर यानी 5.99 प्रतिशत की तेजी के साथ 99.71 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।
इसी तरह डब्ल्यूटीआई क्रूड ने 87.73 डॉलर प्रति बैरल से कारोबार शुरू किया और कुछ ही समय में 91.42 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। बाद में इसमें मामूली नरमी आई, लेकिन शाम 6:30 बजे तक यह 4.32 डॉलर यानी 4.98 प्रतिशत की बढ़त के साथ 91.15 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता रहा।
दो महीने में फिर तेज हुई कीमतें
करीब दो महीने पहले 24 मई को ब्रेंट क्रूड 94.92 से 96.30 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में कारोबार कर रहा था। इसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने की उम्मीद में कीमतें गिरकर एक जुलाई को 71.44 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। हालांकि, छह जुलाई के बाद तनाव दोबारा बढ़ने से कच्चे तेल में लगातार तेजी का रुख बना हुआ है।
युद्ध और आपूर्ति संकट से बढ़ी चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान के बीच शांति वार्ता विफल होने, संघर्षविराम समाप्त होने और दोनों देशों के बीच लगातार सैन्य कार्रवाई के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है। इसी वजह से पिछले पांच कारोबारी सत्रों से कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी देखने को मिल रही है।
भारत पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर लंबे समय तक बना रहता है, तो भारत जैसे कच्चे तेल के बड़े आयातक देशों की अर्थव्यवस्था पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी के कार्यकारी निदेशक अनिल भंसाली के अनुसार, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें लंबे समय तक रहने पर भारत का चालू खाता घाटा (करंट अकाउंट डेफिसिट) बढ़ सकता है, आयात बिल में भारी वृद्धि हो सकती है और विदेशी पूंजी निकासी तेज होने से रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है। इससे महंगाई और आर्थिक चुनौतियां बढ़ने की आशंका है।






