सारंडा में सरेंडर की आहट: एक करोड़ का इनामी मिसिर बेसरा भी रडार पर, संगठन में टूट के संकेत

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चाईबासा/पश्चिमी सिंहभूम:सारांडा जंगल में नक्सल गतिविधियों को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। कभी रेड कॉरिडोर का मजबूत गढ़ रहे इस इलाके में अब आत्मसमर्पण की हलचल तेज हो गई है। सुरक्षाबलों के लगातार ऑपरेशन, बढ़ती घेराबंदी और संगठन के भीतर मतभेदों के कारण नक्सली कैडरों में बेचैनी साफ दिखाई दे रही है। खबर है कि एक करोड़ के इनामी नक्सली कमांडर मिसिर बेसरा भी सरेंडर पर विचार कर रहा है।

सुरक्षाबलों का दबाव, कमजोर पड़ता नेटवर्क

पिछले दो वर्षों से सुरक्षाबलों द्वारा लगातार चलाए जा रहे अभियानों ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है। हाल के महीनों में हुई मुठभेड़ों में 17 नक्सलियों के मारे जाने के बाद सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल काफी बढ़ा है। तीन महीने से जंगल में नक्सलियों की गतिविधियां बेहद सीमित हो गई हैं और वे लगातार ठिकाने बदलने को मजबूर हैं।

आईईडी ढाल भी बेअसर

सारंडा में लगाए गए 400 से अधिक आईईडी बम पहले नक्सलियों की सुरक्षा का बड़ा सहारा थे, लेकिन अब सुरक्षाबल तेजी से इन्हें निष्क्रिय कर रहे हैं। इसके चलते उनकी सुरक्षा व्यवस्था कमजोर हो चुकी है। अनुमान है कि अब इलाके में केवल 45-50 नक्सली ही सक्रिय बचे हैं।

संगठन में दो फाड़

सूत्रों के अनुसार नक्सली संगठन अब दो गुटों में बंटता दिख रहा है।

  • एक गुट मुख्यधारा में लौटने और सरेंडर के पक्ष में है
  • दूसरा गुट अब भी सशस्त्र संघर्ष जारी रखना चाहता है

स्थानीय नक्सली सरेंडर की ओर झुक रहे हैं, जबकि बाहरी राज्यों से जुड़े कमांडर संघर्ष जारी रखने के पक्ष में हैं। इससे संगठन के भीतर तनाव बढ़ गया है।

मिसिर बेसरा पर बढ़ा दबाव

मिसिर बेसरा पर आत्मसमर्पण का दबाव लगातार बढ़ रहा है। बताया जा रहा है कि वह संगठन के भीतर खुद को अलग-थलग महसूस कर रहा है। परिवार, खासकर बेटे की भावनात्मक अपील, उस पर असर डाल रही है।

‘किशन दा’ की चिट्ठी बनी टर्निंग पॉइंट

नक्सली नेता प्रशांत बोस (किशन दा) की मौत से पहले लिखी गई चिट्ठी अब चर्चा में है। इस पत्र में उन्होंने मौजूदा परिस्थितियों में सशस्त्र संघर्ष को कठिन बताते हुए आत्मसमर्पण जैसे विकल्पों पर विचार करने की बात कही थी। इसे संगठन के भीतर बड़ा संकेत माना जा रहा है।

सरेंडर का आकर्षण: इनाम और सुरक्षित भविष्य

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मिसिर बेसरा सरेंडर करता है, तो उसे घोषित एक करोड़ रुपये का इनाम मिल सकता है। यह उसके और उसके परिवार के लिए सुरक्षित जीवन का रास्ता खोल सकता है, जबकि जंगल में रहना अब लगातार खतरे से भरा है।

पुलिस की रणनीति: परिवार के जरिए दबाव

पुलिस मुख्यालय के अनुसार कई नक्सली आत्मसमर्पण के लिए संपर्क में हैं। सुरक्षाबल उनके परिवारों के माध्यम से भी उन्हें मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। साथ ही चेतावनी भी दी जा रही है—हथियार छोड़ें या कड़ी कार्रवाई का सामना करें।

झारखंड में नक्सल प्रभाव सिमटता हुआ

पुलिस के मुताबिक राज्य का करीब 95% हिस्सा अब नक्सल प्रभाव से मुक्त हो चुका है। सारंडा जैसे कुछ इलाकों में ही सीमित संख्या में नक्सली सक्रिय हैं। संगठन में बाहरी कमांडरों का बढ़ता प्रभाव और स्थानीय कैडरों में असंतोष भी इसके कमजोर होने की बड़ी वजह बन रहा है।

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