भारत-रूस RELOS समझौता लागू, सैन्य सहयोग को मिलेगा नया आयाम

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लॉजिस्टिक सपोर्ट के आदान-प्रदान से दोनों देशों की सेनाओं को मिलेगी पारस्परिक सुविधा, संयुक्त अभ्यास और ऑपरेशन होंगे आसान

नई दिल्ली: भारत और रूस के बीच बहुप्रतीक्षित लॉजिस्टिक समझौता RELOS (Reciprocal Exchange of Logistics Support) जनवरी 2026 से लागू हो गया है। इस समझौते के तहत दोनों देश एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं—जैसे बंदरगाह, हवाई अड्डे और बेस—का उपयोग लॉजिस्टिक जरूरतों के लिए कर सकेंगे।

रूसी संसद द्वारा दिसंबर 2025 में मंजूरी मिलने के बाद यह समझौता औपचारिक रूप से लागू हुआ। यह व्यवस्था शुरुआती तौर पर पांच वर्षों के लिए प्रभावी रहेगी, जिसे आपसी सहमति से आगे बढ़ाया जा सकता है।

क्या है समझौते की मुख्य व्यवस्था?
RELOS के तहत दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के क्षेत्र में सीमित संख्या में सैन्य संसाधनों के साथ अस्थायी रूप से तैनात हो सकती हैं। इसमें अधिकतम 3,000 सैनिकों, 5 युद्धपोतों और 10 सैन्य विमानों तक की सीमा तय की गई है। हालांकि, यह स्थायी तैनाती नहीं बल्कि जरूरत के आधार पर अस्थायी उपस्थिति और सहयोग की व्यवस्था है।

समझौते में सैन्य जहाजों के लिए बंदरगाह सेवाएं, मरम्मत, ईंधन, भोजन और तकनीकी सहायता शामिल है। वहीं सैन्य विमानों के लिए हवाई यातायात नियंत्रण, नेविगेशन, पार्किंग, सुरक्षा और ईंधन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।

सैन्य सहयोग को मिलेगी मजबूती
यह समझौता भारत-रूस के दशकों पुराने रक्षा संबंधों को और मजबूत करेगा। विशेष रूप से भारत के रूसी मूल के सैन्य उपकरणों के रखरखाव और मरम्मत में यह अहम भूमिका निभाएगा।

इसके अलावा, संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण कार्यक्रम और मानवीय सहायता मिशनों को भी इससे गति मिलेगी।

रणनीतिक मायने
विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझौता ऐसे समय में लागू हुआ है जब वैश्विक स्तर पर सुरक्षा चुनौतियां बढ़ रही हैं, खासकर रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते। RELOS के जरिए भारत को रूसी सैन्य ठिकानों तक, जबकि रूस को भारतीय सुविधाओं तक बेहतर पहुंच मिलेगी, जिससे दोनों देशों की ऑपरेशनल क्षमता और रणनीतिक तालमेल में बढ़ोतरी होगी।

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