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भागलपुर में मस्जिदों में बढ़ी रौनक, शबे क़द्र की तलाश में इबादत में जुटे मोमिन

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भागलपुर। रमज़ान मुबारक के बरकत भरे महीने का आख़िरी अशरा शुरू होते ही शहर की मस्जिदों में इबादत करने वालों की संख्या में काफ़ी बढ़ोतरी हो गई है।

सुन्नत-ए-नबवी पर अमल करते हुए दूसरे अशरे के पूरा होते ही बड़ी संख्या में मोमिन एतिकाफ़ में बैठ गए हैं और शबे क़द्र की अज़ीम नेमत हासिल करने के लिए दिन-रात इबादत और रियाज़त में मशगूल हैं। भागलपुर के ख़लीफ़ा बाग स्थित शाही जामा मस्जिद में भी दो दर्जन से ज़्यादा लोग एतिकाफ़ की सआदत हासिल कर रहे हैं, , जिससे मस्जिद का माहौल बेहद रूहानी और नूरानी नज़र आ रहा है। इस्लामी तालीमात के मुताबिक़ रसूल-ए-अकरम हज़रत मुहम्मद रमज़ान के आख़िरी अशरे में दुनियावी मशगूलियत से अलग होकर मस्जिद में एतिकाफ़ फ़रमाया करते थे और पूरी तरह अल्लाह की इबादत में मशगूल रहते थे। उसी सुन्नत की पैरवी में आज भी दुनिया भर की मस्जिदों में एतिकाफ़ का एहतमाम किया जाता है, ताकि बंदे शबे क़द्र जैसी मुबारक रात को पा सकें और अल्लाह की रहमत और मग़फिरत के हक़दार बन सकें।

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इस मौके पर खानकाह पीर दमड़िया शाह के सज्जादा नशीन सैयद शाह फखरे आलम हसन ने कहा कि मौजूदा फ़ितनों और माद्दापरस्ती के दौर में जो लोग दुनियावी व्यस्तताओं से अलग होकर सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा के लिए एतिकाफ़ जैसी अज़ीम सुन्नत को ज़िंदा कर रहे हैं, वे क़ाबिल-ए-रश्क और क़ाबिल-ए-मुबारकबाद हैं। उन्होंने कहा कि एतिकाफ़ इंसान को अल्लाह के क़रीब करता है और उसके दिल में रूहानियत, तक़वा और बंदगी का जज़्बा पैदा करता है। उन्होंने आगे कहा कि ख़लीफ़ाबाग की शाही जामा मस्जिद लगभग चार सौ साल पुरानी एक ऐतिहासिक मस्जिद है और यहाँ हर दौर में लोग एतिकाफ़ की सुन्नत को ज़िंदा रखते आए हैं। यह रिवायत आज भी जारी है, जिस पर हम अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं और दुआ करते हैं कि यह रूहानी सिलसिला आगे भी इसी तरह क़ायम रहे। सज्जादानशीन ने कहा कि इस माद्दापरस्ती के दौर में भी अगर कोई बंदा अल्लाह की क़ुरबत हासिल करने और सच्ची बंदगी का इज़हार करने के लिए मस्जिद में एतिकाफ़ करता है, तो यह उसके मज़बूत ईमान की निशानी है। एतिकाफ़ दरअसल इंसान को दुनियावी फ़िक्रों से आज़ाद कर अल्लाह की इबादत, ज़िक्र और तफ़क्कुर की तरफ़ मुतवज्जेह कर देता है।

उन्होंने शबे क़द्र की फ़ज़ीलत बयान करते हुए कहा कि क़ुरआन शरीफ़ में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है कि शबे क़द्र हज़ार महीनों से बेहतर है। यानी जो शख़्स ख़ुलूस और ख़ुशू के साथ इस रात में इबादत करता है, उसे मानो चौरासी साल से ज़्यादा इबादत का सवाब मिलता है। यही वजह है कि मोमिन रमज़ान के आख़िरी अशरे में शबे क़द्र की तलाश में ख़ास तौर पर इबादत, तिलावत-ए-क़ुरआन, ज़िक्र और नफ़्ल नमाज़ों का एहतमाम करते हैं। रमज़ान के आख़िरी अशरे में मस्जिदों में मुतक़िफ़ीन की मौजूदगी से न सिर्फ़ इबादत का माहौल और भी रूहानी बन जाता है, बल्कि नौजवानों और आम लोगों में भी दीन और इबादत की तरफ़ रुझान बढ़ता है। शहर की मस्जिदों में देर रात तक क़ुरआन की तिलावत, दुआ और इबादत का सिलसिला जारी रहता है, जिससे पूरा माहौल रूहानियत और नूरानियत से भर जाता है।

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