कोलकाता, 21 सितंबर । भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे को लेकर 12 दिसंबर 1996 को हुई गंगा जल संधि (फरक्का जल संधि) की 30 वर्ष की अवधि 12 दिसंबर 2026 को समाप्त होने वाली है। संधि के नवीकरण से पहले बिहार और पश्चिम बंगाल ने अपने-अपने हितों और चिंताओं को केंद्र सरकार के सामने रखना शुरू कर दिया है।
एक ओर बिहार में जदयू मौजूदा व्यवस्था को उसी स्वरूप में आगे बढ़ाने के बजाय भविष्य की जरूरतों और बदलती जल परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए नई व्यवस्था तथा वैज्ञानिक समीक्षा की मांग कर रही है। वहीं, पश्चिम बंगाल सरकार ने भी कहा है कि किसी भी नई व्यवस्था में राज्य के हितों और उसकी जल संबंधी जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
हुगली में पर्याप्त जल प्रवाह बनाए रखने पर बंगाल का जोर
पश्चिम बंगाल सरकार ने केंद्र के सामने मुख्य रूप से सूखे मौसम में हुगली नदी में पर्याप्त जल प्रवाह बनाए रखने का मुद्दा उठाया है। राज्य का कहना है कि फरक्का से पर्याप्त पानी हुगली में पहुंचना जरूरी है, क्योंकि इसका संबंध हुगली की नौवहन क्षमता और कोलकाता स्थित श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट के संचालन से है।
राज्य सरकार के अनुसार जल प्रवाह में कमी होने पर गाद जमने और नौवहन संबंधी समस्याओं का असर बंदरगाह, व्यापार तथा आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।
मालदा, मुर्शिदाबाद और नदिया में कटाव-बाढ़ का मुद्दा
पश्चिम बंगाल ने मालदा, मुर्शिदाबाद और नदिया में नदी कटाव, गाद जमने और बाढ़ की समस्या को भी केंद्र के समक्ष उठाया है। राज्य का तर्क है कि भविष्य की जल व्यवस्था केवल भारत और बांग्लादेश के बीच पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
राज्य ने नदी के पर्यावरण, बदलते जल प्रवाह, भविष्य की जल जरूरतों और विकास संबंधी आवश्यकताओं को भी नई व्यवस्था में शामिल करने की मांग की है।
ज्वाइंट रिवर्स कमीशन के माध्यम से चर्चा की मांग
पश्चिम बंगाल सरकार ने केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की आंतरिक प्रक्रिया के तहत अपनी चिंताएं रखी हैं। राज्य ने भारत-बांग्लादेश ज्वाइंट रिवर्स कमीशन के माध्यम से विस्तृत चर्चा की जरूरत पर भी जोर दिया है।
राज्य के अनुसार नई व्यवस्था तैयार करते समय नदी की मौजूदा स्थिति और उससे जुड़े पर्यावरणीय एवं आर्थिक पहलुओं का भी अध्ययन किया जाना चाहिए।
बिहार की चिंता अलग, वैज्ञानिक समीक्षा की मांग
वहीं, बिहार में जदयू ने फरक्का व्यवस्था को लेकर अलग तरह की चिंता जताई है। पार्टी का कहना है कि गंगा फरक्का पहुंचने से पहले बिहार से होकर गुजरती है, लेकिन जल बंटवारे से जुड़े निर्णयों में राज्य की भूमिका पर्याप्त रूप से सुनिश्चित नहीं है।
जदयू ने गाद जमने, नदी तल के ऊंचे होने, कटाव और बाढ़ जैसी समस्याओं का मुद्दा उठाते हुए 1996 की संधि को उसी स्वरूप में नवीनीकृत करने के बजाय भविष्य की जरूरतों के अनुरूप नई व्यवस्था बनाने की मांग की है। पार्टी ने बिहार की पेयजल, सिंचाई और औद्योगिक जरूरतों को ध्यान में रखने तथा बातचीत में राज्य को उचित प्रतिनिधित्व देने की मांग की है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार केंद्र ने भी कहा है कि संधि के भविष्य पर फैसला लेते समय बिहार की जल संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखा जाएगा।
केंद्र के स्तर पर होंगे महत्वपूर्ण फैसले
फरक्का बैराज के सुपरिटेंडेंट इंजीनियर-कम-कोऑर्डिनेटर रामजीत बर्मा के अनुसार फरक्का जल संधि को लेकर बिहार सरकार की ओर से पत्र भेजा गया है, जबकि पश्चिम बंगाल सरकार ने भी अपने हितों और चिंताओं को मंत्रालय के समक्ष रखा है।
उन्होंने कहा कि संधि से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले केंद्र सरकार के स्तर पर लिए जाएंगे और संबंधित राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ विचार-विमर्श किया जाएगा।
बर्मा के मुताबिक फरक्का बैराज की भूमिका मुख्य रूप से संधि लागू होने के बाद उसके प्रावधानों के क्रियान्वयन तक सीमित रहती है। पानी के संयुक्त अवलोकन और माप का काम केंद्रीय जल आयोग के अंतर्गत किया जाता है।
फरक्का बैराज और जल संधि अलग-अलग विषय
फरक्का बैराज और फरक्का जल संधि को एक ही विषय मानना उचित नहीं है। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में गंगा पर बने फरक्का बैराज को 1975 में चालू किया गया था। इसका उद्देश्य गंगा के पानी को फरक्का फीडर नहर के जरिए हुगली में पहुंचाना था, ताकि गाद की समस्या को कम किया जा सके और कोलकाता बंदरगाह की नौवहन क्षमता बनाए रखने में मदद मिले।
दूसरी ओर, 1996 की गंगा जल संधि भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा के पानी के बंटवारे से संबंधित द्विपक्षीय समझौता है।
1996 की संधि में सूखे मौसम के पानी का बंटवारा
फरक्का के बाद गंगा बांग्लादेश में प्रवेश करती है, जहां इसे पद्मा कहा जाता है। 1996 की संधि के तहत प्रत्येक वर्ष 1 जनवरी से 31 मई तक सूखे मौसम में फरक्का पर उपलब्ध पानी को निर्धारित व्यवस्था के आधार पर भारत और बांग्लादेश के बीच बांटा जाता है।
बांग्लादेश की ओर से लंबे समय से यह चिंता जताई जाती रही है कि सूखे मौसम में फरक्का से पानी मोड़े जाने का असर उसके हिस्से में उपलब्ध जल पर पड़ता है। वहां कृषि, मत्स्य पालन, पर्यावरण और आजीविका से जुड़े प्रभावों को लेकर भी चिंता व्यक्त की जाती रही है।
जल प्रवाह के आंकड़े जुटा रही हैं दोनों देशों की टीमें
संधि की अवधि समाप्त होने से पहले भारत और बांग्लादेश की तकनीकी टीमें फरक्का और बांग्लादेश के हार्डिंग ब्रिज पर जल प्रवाह से जुड़े आंकड़े जुटा रही हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार दोनों पक्षों के बीच ज्वाइंट रिवर्स कमीशन के स्तर पर भी बातचीत हुई है और फरक्का में संयुक्त रूप से जल प्रवाह का निरीक्षण किया गया है।
इससे नई व्यवस्था तैयार करने के लिए मौजूदा जल प्रवाह और नदी की बदलती परिस्थितियों से जुड़े आंकड़ों को आधार बनाने की प्रक्रिया का संकेत मिलता है।
बदलती जल परिस्थितियों ने बढ़ाई चुनौती
1996 में बनी व्यवस्था के करीब तीन दशक बाद गंगा नदी की जल परिस्थितियों, वर्षा के पैटर्न और विभिन्न क्षेत्रों की जल जरूरतों में बदलाव आया है। भारतीय विश्व मामलों की परिषद (ICWA) के एक हालिया विश्लेषण में भी कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन और बदलती हाइड्रोलॉजी ने उस जल संबंधी आधार को प्रभावित किया है, जिस पर 1996 की व्यवस्था तैयार की गई थी।
ऐसे में भविष्य की व्यवस्था में केवल मौजूदा जल बंटवारे के फार्मूले को बनाए रखने के बजाय बदलती परिस्थितियों और दीर्घकालिक जरूरतों पर भी विचार किए जाने की चर्चा हो रही है।
बिहार और बंगाल की चिंताएं अलग-अलग, केंद्र के सामने चुनौती
पूरे मामले में बिहार और पश्चिम बंगाल की प्राथमिकताएं अलग-अलग दिखाई देती हैं। बिहार गाद, नदी कटाव और बाढ़ के साथ अपनी भविष्य की पेयजल, सिंचाई और औद्योगिक जरूरतों को नई व्यवस्था में शामिल कराने पर जोर दे रहा है। वहीं पश्चिम बंगाल हुगली में पर्याप्त जल प्रवाह, कोलकाता बंदरगाह की नौवहन क्षमता तथा मालदा, मुर्शिदाबाद और नदिया जैसे क्षेत्रों में कटाव और बाढ़ की समस्याओं को प्रमुखता दे रहा है।
दूसरी ओर, बांग्लादेश अपने हिस्से के पानी और नदी से जुड़े पर्यावरणीय हितों को लेकर अपनी चिंताएं रखता रहा है।
दिसंबर में समाप्त होगी 30 साल पुरानी व्यवस्था
12 दिसंबर 2026 को 1996 की गंगा जल संधि की अवधि पूरी हो जाएगी। इससे पहले केंद्र सरकार के सामने भारत-बांग्लादेश के बीच भविष्य की जल व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय लेने की प्रक्रिया है। विदेश मंत्रालय और जल शक्ति मंत्रालय इस प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभाएंगे।
बदलती जलवायु, गंगा के जल प्रवाह में बदलाव, बढ़ती आबादी और राज्यों की बढ़ती जल जरूरतों को देखते हुए आने वाले वर्षों के लिए ऐसी व्यवस्था तैयार करना महत्वपूर्ण होगा, जिसमें सभी संबंधित पक्षों की चिंताओं पर विचार किया जा सके।
फरक्का का मुद्दा अब व्यापक जल सुरक्षा का सवाल
फरक्का का मुद्दा अब केवल भारत-बांग्लादेश के बीच पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं रह गया है। यह बिहार की जल सुरक्षा, पश्चिम बंगाल की आर्थिक और पर्यावरणीय जरूरतों, कोलकाता बंदरगाह की नौवहन व्यवस्था, नदी कटाव और बाढ़ तथा भारत-बांग्लादेश संबंधों से जुड़ा व्यापक विषय बन चुका है।
अब निगाहें केंद्र सरकार की उस प्रक्रिया पर हैं, जिसके जरिए बिहार, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश से जुड़े हितों तथा बदलती जल परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए 1996 की संधि के बाद की व्यवस्था को लेकर निर्णय लिया जाएगा।






