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प्रख्यात वैज्ञानिक और पारिस्थितिकीविद डॉ. माधव गाडगिल का पुणे निधन

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मुंबई। महाराष्ट्र के पुणे निवासी प्रख्यात वैज्ञानिक और पारिस्थिकीविद डॉ. माधव गाडगिल (82) का बीती रात पुणे स्थित डॉ. शिरीष प्रयाग हॉस्पिटल में निधन हो गया। पिछले कुछ दिनों से डॉ. माधव गाडगिल का इस अस्पताल में इलाज हो रहा था। यह जानकारी माधव गाडगिल के बेटे सिद्धार्थ गाडगिल ने गुरुवार को दी।

सिद्धार्थ गाडगिल ने बताया कि आज शाम को उनके पिता माधव गाडगिल का पुणे के वैकुंठ श्मशान घाट में अंतिम संस्कार किया जाएगा।पारिस्थिकीविद डॉ. गाडगिल को भारत के अग्रणी पर्यावरण चिंतकों में गिना जाता था। उन्हें ‘धरती पुत्र’ भी कहा जाता है। उन्होंने पूरी जिंदगी भारत में पर्यावरणीय, खासकर वेस्टर्न घाट की जैव विविधता के बारे में जागरूकता को जिंदा रखने की कोशिश की। माधव गाडगिल ने ही सबसे पहले प्रशासन को चेतावनी दी थी कि पश्चिमी घाट में हो रहे विकास के काम से घाट के जानवरों और पेड़-पौधों और पूरे पारिस्थिकी संतुलन के लिए बड़ा संकट पैदा हो सकता है।

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पारिस्थिकीविद डॉ.गाडगिल की 2011 में तैयार की गई गाडगिल रिपोर्ट एक आईना थी, जिसने उस सोच की कड़वी सच्चाई को दिखाया जो विकास के काम के लिए पर्यावरण जैव विविधता को नुकसान पहुंचाने के लिए हमेशा तैयार रहती है। संयुक्त राष्ट्र ने भी भारत में पर्यावरण के मुद्दों पर डॉ. माधव गाडगिल के योगदान पर ध्यान दिया। गाडगिल को 2024 (संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम) यूएनपीई के ‘चैंपियन ऑफ़ द अर्थ’ अवॉर्ड से सम्मानित

किया गया था। यूएनपीई की ओर से डॉ. गाडगिल की तारीफ़ में एक बयान में कहा गया था, “अपने छह दशक के वैज्ञानिक जीवन के दौरान, डॉ. माधव गाडगिल का सफऱ उन्हें हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के हॉल से लेकर भारत सरकार के सबसे ऊँचे पदों तक ले गया। लेकिन इस पूरे सफऱ में माधव गाडगिल खुद को ‘लोगों का साइंटिस्ट’ मानते थे।”

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वर्ष 2021 में वैज्ञानिक डॉ. गाडगिल ने बाढ़ और बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं पर सुझाव देने वाली और ज़रूरी बातें कहीं। उन्होंने कहा, “वेस्टर्न घाट में यह पहली बार नहीं है। पिछले कुछ सालों से यहां ऐसी घटनाएं हो रही हैं। हमने पिछले 50 सालों में हिमालय में ऐसी बाढ़ देखी है। 1972 में उत्तराखंड में चिपको आंदोलन असल में अलकनंदा में जंगलों की कटाई और लैंडस्लाइड से आने वाली बाढ़ के विरोध में शुरू हुआ था। ये घटनाएं पिछले कुछ सालों में बढ़ती जा रही हैं।

हिमालय की बनावट इंडियन और यूरेशियन प्लेटों के टकराने के बाद बनी वैली पर्वत श्रृंखला है। वहां की ज़मीन एवलांच और लैंडस्लाइड के लिए ज़्यादा संवेदनशील है। इसके विपरीत वेस्टर्न घाट में पहाड़ों की रेंज ज्वालामुखी फटने से बनी चट्टानों की वजह से बनी हैं।” 2011 में डॉ. गाडगिल की अध्यक्षता में वेस्टर्न घाट एक्सपर्ट कमेटी बनाई गई थी। इस कमेटी ने वेस्टर्न घाट में 1 लाख 29 हज़ार 037 वर्ग किलोमीटर के पूरे इलाके को पर्यावरण के लिहाज़ से संवेदनशील घोषित करने की सिफारिश की थी। क्योंकि यह इलाका जंगलों से भरा था और कई खतरे में पड़ी प्रजातियां पाई जाती थीं। इस रिपोर्ट की कुछ राज्यों ने यह कहते हुए आलोचना की थी कि पाबंदियों का तरीका गलत था। तीन साल बाद, वैज्ञानिक के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में एक और कमेटी बनाई गई। इस कमेटी ने इस प्रतिशत को 75 प्रतिशत से घटाकर 50 फीसद कर दिया। लेकिन यह रिपोर्ट भी अभी तक पूरी तरह से लागू नहीं हुई है।

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