बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास पर झारखंड हाईकोर्ट सख्त, गढ़वा डीसी को निर्देश

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रांची, 14 मई। झारखंड उच्च न्यायालय ने बंधुआ मजदूरों को मुआवजा, पुनर्वास और सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने संबंधी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार और प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं।

मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने गढ़वा जिले के उपायुक्त को निर्देश दिया कि प्रार्थी द्वारा उपलब्ध कराई गई बंधुआ मजदूरों की सूची का सत्यापन किया जाए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि जिन मजदूरों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है, उन्हें अविलंब लाभ उपलब्ध कराया जाए।

300 से अधिक मजदूरों के पुनर्वास की मांग

सुनवाई के दौरान प्रार्थी की ओर से अदालत को बताया गया कि बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम के तहत मुक्त कराए गए 300 से अधिक मजदूरों को तत्काल मुआवजा, पुनर्वास और अन्य सरकारी सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए।

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि सरकार इस दिशा में पर्याप्त ध्यान नहीं दे रही है।

वहीं सरकार की ओर से अधिवक्ता गौरव राज ने पक्ष रखते हुए कहा कि 300 से अधिक लोगों की सूची प्रशासन को उपलब्ध कराई गई है और कार्रवाई की प्रक्रिया जारी है।

गढ़वा डीसी कोर्ट में हुए उपस्थित

सुनवाई के दौरान गढ़वा के उपायुक्त कोर्ट के निर्देश पर उपस्थित हुए।

सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि महाराष्ट्र के सोलापुर से मुक्त कराई गई महिला बंधुआ मजदूरों को वर्ष 2017 में ही आवास, मनरेगा कार्ड और अन्य सरकारी सुविधाएं उपलब्ध करा दी गई थीं।

इसके अलावा उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, भदोही, कानपुर और प्रयागराज जिलों से मुक्त कराए गए बंधुआ मजदूरों के दस्तावेजों का सत्यापन किया जा रहा है।

सरकार के जवाब पर पहले भी जताई थी नाराजगी

पूर्व की सुनवाई में हाईकोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि बंधुआ मजदूरों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए और इस मामले में सरकार को संवेदनशील रवैया अपनाना चाहिए।

अदालत ने सरकार द्वारा दाखिल जवाब को पूरी तरह संतोषजनक नहीं माना था।

कोर्ट ने गढ़वा के वर्तमान और पूर्व उपायुक्त को तलब करते हुए कहा था कि पूर्व में दिए गए निर्देशों के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर मजदूरों को सरकारी लाभ दिलाने की योजना प्रभावी रूप से लागू नहीं की जा सकी है।

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