संथाली भाषा की ओलचिकी लिपि के शताब्दी वर्ष समारोह में शामिल हुईं राष्ट्रपति, उन्होंने गीत भी गाया

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पूर्वी सिंहभूम। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु तीन दिवसीय झारखंड दौरे के दूसरे दिन सोमवार को रांची स्थित लोकभवन से जमशेदपुर पहुंचीं। सोनारी एयरपोर्ट पर राष्ट्रपति का राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार एवं मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने पुष्पगुच्छ देकर स्वागत किया। इस दौरान उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी सहित वरीय अधिकारी मौजूद रहे।

सोनारी एयरपोर्ट से राष्ट्रपति का काफिला करनडीह स्थित दिशोम जाहेर के लिए रवाना हुआ, जहां उन्होंने 22वें संथाली ‘पारसी माहा’ एवं ओलचिकी लिपि के शताब्दी वर्ष समारोह का उद्घाटन किया। कार्यक्रम में राज्यपाल संतोष गंगवार और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी विशेष रूप से उपस्थित रहे। इस सांस्कृतिक आयोजन में संथाली समाज की समृद्ध परंपरा और भाषा के संरक्षण पर जोर दिया गया।

कार्यक्रम के उपरांत राष्ट्रपति सर्किट हाउस पहुंचेंगी। इसके बाद उनका अगला कार्यक्रम आदित्यपुर स्थित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) में प्रस्तावित है, जहां वे एक विशेष कार्यक्रम में भाग लेंगी। राष्ट्रपति के दौरे को लेकर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं और उनके काफिले में करीब 45 वाहन शामिल हैं। राष्ट्रपति के आगमन से जिले में उत्साह और गौरव का माहौल देखने को मिला।

राष्ट्रपति ने गाया गीत

दिशोम जाहेरथान प्रांगण में आयोजित 22वें संताली ‘परसी माहा’ एवं ओल चिकी लिपि शताब्दी समारोह में संथाली भाषा में गीत गाकर माहौल को सुरमयी बना दिया। उन्होंने अपने संबोधन की शुरुआत संथाली नेहोर गीत “जोहार जोहार आयो…” से की, जिसे उन्होंने लगभग तीन मिनट तक गाया। इस दौरान कार्यक्रम में मौजूद लोग मंत्रमुग्ध होकर राष्ट्रपति को सुनते रहे।

ऑल इंडिया संताली राइटर्स एसोसिएशन और दिशोम जाहेरथान कमेटी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रपति ने कहा कि करनडीह आने से पहले उन्होंने जाहेर आयो को नमन किया और गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने अपने जीवन संघर्षों का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज के लोगों का प्रेम और इष्टदेवों का आशीर्वाद ही उन्हें इस मुकाम तक लेकर आया है। राष्ट्रपति ने ओल चिकी लिपि को संथाली समाज की पहचान, आत्मसम्मान और एकता का मजबूत आधार बताया।

राष्ट्रपति मुर्मु ने ऑल इंडिया संताली राइटर्स एसोसिएशन के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि यह संगठन वर्षों से आदिवासी स्वाभिमान और अस्तित्व की रक्षा के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।

राष्ट्रपति ने संविधान के संथाली (ओल चिकी) अनुवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि जब कानून और अधिकारों की जानकारी मातृभाषा में होती है, तब समाज सशक्त बनता है और अज्ञानवश निर्दोष लोगों को सजा से बचाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि संथाली भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है, इसलिए देश को चलाने वाले नियम और कानून की जानकारी भी संथाली समाज को अपनी भाषा में मिलनी चाहिए। उन्होंने चिंता जताई कि कानून की जानकारी के अभाव में कई निर्दोष लोग जेल तक पहुंचे हैं। राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में संथाल समाज के लोग रहते हैं और शिक्षित युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में अपने अधिकारों, भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी समाज के युवाओं की है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वे ओल चिकी लिपि और संथाली समाज के संरक्षण व विकास के लिए लगातार प्रयास करती रहेंगी।

समारोह में शामिल प्रदेश राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने कहा कि यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि जनजातीय संस्कृति की जीवंतता और गौरव का प्रतीक है। उन्होंने राष्ट्रपति मुर्मु के जीवन संघर्ष को पूरे आदिवासी समाज के लिए प्रेरणास्रोत बताया और कहा कि जमशेदपुर सांप्रदायिक सौहार्द और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक शहर है। राज्यपाल ने याद दिलाया कि वर्ष 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में संथाली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था और ओल चिकी लिपि हमारी अमूल्य सांस्कृतिक विरासत है। उन्होंने कहा कि राज्यपाल भवन जनजातीय भाषाओं और संस्कृतियों के संरक्षण के लिए सदैव तत्पर रहेगा।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने संबोधन में कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का संथाली भाषा और ओल चिकी लिपि के विकास में योगदान ऐतिहासिक है। उन्होंने संविधान के संथाली अनुवाद को समाज के लिए मील का पत्थर बताते हुए कहा कि गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू ने संथाली समाज को लिपि देकर जो पहचान दी, उसके लिए पूरा समाज उनका ऋणी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार भी जनजातीय भाषाओं और संस्कृति के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयासरत है।

समारोह के समापन अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने संथाली साहित्य और ओल चिकी लिपि को समृद्ध करने वाले साहित्यकारों, शिक्षकों और साधकों को सम्मानित किया। सम्मानित होने वालों में शोभनाथ बेसरा, पद्मश्री डॉ. दमयंती बेसरा, मुचीराम हेम्ब्रॉम, भीमवार मुर्मू, साखी मुर्मू, रामदास मुर्मू, चुंडा सोरेन सिपाही, छोतराय बास्के, निरंजन हंसदा, बी.बी. सुंदरमन, सौरव, शिव शंकर कंडेयांग, सी.आर. माझी सहित कई अन्य नाम शामिल रहे।

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