इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, पीड़िता की मां ने ली राहत की सांस

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नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश पर स्वत: संज्ञान लेते हुए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिसमें उच्च न्यायालय ने कहा था कि पायजामे का नाड़ा खींचना रेप का प्रयास नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले को खारिज कर दिया है। इस फैसले के बाद पीड़िता की मां ने खुशी जाहिर करते हुए राहत की सांस ली है। नाबालिग पीड़िता की मां ने कहा कि इस आदेश से न्याय में उनका भरोसा बहाल हुआ है।

पीड़िता, जो घटना के समय सिर्फ 11 वर्ष की थी, की मां ने कहा, “इस फैसले से मेरा यह विश्वास बहाल हुआ है कि कानून बच्चों व पीड़ितों की सुरक्षा कर सकता है। मुझे उम्मीद है कि अब किसी बच्चे को अपने साथ हुए अत्याचार का विश्वास दिलाने के लिए ठोकर नहीं खानी पड़ेगी और इस फैसले से उन बहुत सारे बच्चों को मदद मिलेगी जो आवाज नहीं उठा पा रहे हैं।” उन्होंने कहा कि जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) तब उनके साथ खड़ा हुआ जब उन्हें लग रहा था कि वे असहाय हैं और कोई उनकी आवाज नहीं सुनेगा। उनके समर्थन से हम न्याय के लिए संघर्ष जारी रखने की हिम्मत जुटा पाए।

नवंबर 2021 में उत्तर प्रदेश के कासंगज में दो युवक 11 साल की नाबालिग बच्ची को जबरन घसीट कर एक पुलिया के नीचे ले गए और उसके कपड़े उतारने की कोशिश की। बच्ची की चीख पुकार सुन उधर से गुजर रहे दो राहगीर वहां पहुंचे जिसके बाद दोनों आरोपित मौके से भाग निकले।

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की ओर से पीड़िता की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एच. एस. फूलका ने इसे ऐतिहासिक करार देते हुए कहा, “यह बच्चों की सुरक्षा को सुदृढ़ करने की दिशा में एक दूरगामी फैसला है। यह एक स्पष्ट संदेश देता है कि न्यायिक विवेचना में पीड़ितों के खिलाफ किसी भी तरह के भेदभाव या पूर्वाग्रह की कोई जगह नहीं है। इस फैसले के लिए हम खंडपीठ के आभारी हैं।” उच्चतम न्यायालय ने दिशानिर्देश तय करने में नेटवर्क से सुझाव भी मांगे हैं।

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत ने कहा, “यह फैसला यौन हिंसा के पीड़ितों के लिए न्याय, गरिमा और संवेदनशीलता सुनिश्चित करने के हमारे लंबे और दृढ़ संघर्ष का नतीजा है। हम सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हैं जिसने न्यायिक तंत्र में भरोसा बहाल किया है और इस विश्वास को मजबूत किया है कि बच्चों एवं कमजोर व संवेदनशील पृष्ठभूमि के लोगों के खिलाफ अपराधों को गंभीरता और अपेक्षित संवेदनशीलता के साथ देखा जाएगा।”

उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पिछले साल मार्च में दिए गए फैसले में कहा था कि नाबालिग पीड़िता के वक्ष पकड़ने व सलवार का नाड़ा खोलने को बलात्कार का “प्रयास” नहीं माना जा सकता और यह सिर्फ बलात्कार की “तैयारी” थी। बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए नागरिक समाज संगठनों के नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) ने हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ तत्काल पीड़िता की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और एन. वी. अंजारिया की खंडपीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण और आपराधिक दंड विधान के स्थापित सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ करार देते हुए खारिज कर दिया। साथ ही, शीर्ष अदालत ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत दोनों आरोपितों के खिलाफ पहले से लगे बलात्कार के प्रयास के आरोप को भी बहाल कर दिया।

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