नई दिल्ली, 28 सितंबर। यूपीआई के जरिए 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने फिलहाल इस व्यवस्था पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया।
अदालत ने मामले में केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है।
2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा UPI भुगतान पर MDR
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में यूपीआई भुगतान पर MDR लगाए जाने की वैधता को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि जनवरी 2020 से लागू जीरो-MDR व्यवस्था में बदलाव पर्याप्त कानूनी प्रक्रिया, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना किया गया है।
याचिका में 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा UPI मर्चेंट लेनदेन पर MDR लगाने के फैसले की कानूनी वैधता की जांच की मांग की गई है।
15 अक्टूबर से लागू होने का प्रस्ताव
जानकारी के मुताबिक, NPCI ने 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से अधिक के कुछ चुनिंदा व्यापारी UPI लेनदेन पर MDR लागू करने का फैसला किया है। सामान्य तौर पर ऐसे लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क निर्धारित किया गया है।
वहीं, 75,000 रुपये या उससे अधिक के भुगतान पर MDR की अधिकतम सीमा 300 रुपये रखी गई है। हालांकि, यह शुल्क सभी UPI लेनदेन पर लागू नहीं होगा।
व्यक्ति से व्यक्ति के भुगतान पर शुल्क नहीं
नई व्यवस्था के तहत एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच होने वाले UPI लेनदेन पर MDR नहीं लगाया जाएगा। शुल्क मुख्य रूप से निर्धारित श्रेणी के मर्चेंट लेनदेन पर लागू होगा।
छोटे व्यापारियों को भी राहत
प्रस्तावित व्यवस्था में छोटे व्यापारियों के लिए भी राहत का प्रावधान रखा गया है। UPI QR के जरिए हर महीने एक लाख रुपये तक प्राप्त करने वाले छोटे व्यापारियों से MDR नहीं लिया जाएगा।
वहीं, रेलवे, टेलीकॉम, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट जैसे कुछ क्षेत्रों में 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर 5 रुपये का निश्चित शुल्क निर्धारित किया गया है।
चार सप्ताह में जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल MDR लागू करने की व्यवस्था पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार करते हुए केंद्र सरकार, RBI और NPCI समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। अदालत ने सभी संबंधित पक्षों से चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई में इस व्यवस्था की कानूनी वैधता से जुड़े मुद्दों पर आगे विचार किया जाएगा।






