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सत्ता से संसद तक: 20 साल के स्वर्णिम दौर का भावुक समापन

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CM कुर्सी को अलविदा: राष्ट्रीय राजनीति में नई भूमिका निभाएंगे नीतीश कुमार

पटना: बिहार की राजनीति एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। Nitish Kumar अब केवल एक पद नहीं छोड़ रहे, बल्कि उनके साथ एक पूरे राजनीतिक दौर का अंत होता नजर आ रहा है। कल के बाद बिहार की राजनीति में एक ऐसा खालीपन महसूस होगा, जिसे भरना आसान नहीं होगा।

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दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उनके शब्द—“अब वहां का छोड़, यहीं काम करेंगे”—भावुक कर देने वाले थे। यह बयान उनके नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत का संकेत भी देता है।

अगले 18 घंटों में केंद्र की राजनीति का हिस्सा

करीब दो दशकों तक बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे नीतीश कुमार अब राष्ट्रीय राजनीति में औपचारिक रूप से प्रवेश करने जा रहे हैं। वे जल्द ही Rajya Sabha के सदस्य के रूप में शपथ लेंगे। इसके साथ ही बिहार के मुख्यमंत्री पद से उनके इस्तीफे की भी संभावना है। भले ही उनकी विदाई के लिए कोई भव्य समारोह न हो, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक माहौल में भावुकता साफ महसूस की जा रही है।

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नई भूमिका में जाने को तैयार

सत्ता के शीर्ष पर सबसे लंबे समय तक बने रहने वाले नेताओं में शुमार नीतीश कुमार अब नई भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने के बाद वे मुख्यमंत्री पद से खुद को अलग कर सकते हैं। यह केवल औपचारिक बदलाव नहीं, बल्कि उस युग का अंत होगा जिसने बिहार की राजनीति को लगभग दो दशकों तक दिशा दी।

बिहार के ‘भगीरथ’ नीतीश

2005 में शुरू हुआ उनका स्वर्णिम राजनीतिक दौर 2026 में एक नए मोड़ पर पहुंच रहा है। इस सफर में उन्हें ‘सुशासन बाबू’, ‘नीतीश बाबू’ और ‘नीतीश चाचा’ जैसे कई नाम मिले। उनके कार्यकाल में सड़कों, पुलों, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था के क्षेत्र में बड़े बदलाव देखने को मिले। गंगा पर बने पुलों और जल परियोजनाओं ने उन्हें विकास के ‘भगीरथ’ के रूप में स्थापित किया।

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CM से संसद तक: 20 वर्षों का प्रभावशाली सफर

नीतीश कुमार ने पटना से लेकर सुदूर ग्रामीण इलाकों तक बुनियादी ढांचे को मजबूत किया। उनके प्रयासों से बिहार की छवि में बदलाव आया और राज्य ने विकास की नई पहचान बनाई। उन्होंने अपने लंबे कार्यकाल में 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर एक रिकॉर्ड भी कायम किया।

राजनीति के हर रंग देखे

बिहार की राजनीति में कई उतार-चढ़ाव आए। कभी Rashtriya Janata Dal (राजद) तो कभी Bharatiya Janata Party (भाजपा) के साथ गठबंधन हुआ, लेकिन एक चेहरा स्थिर रहा—नीतीश कुमार का। राजनीतिक आलोचनाओं के बावजूद वे बिहार की सत्ता के केंद्र में बने रहे।

इस बार कहानी अलग क्यों?

इस बार सत्ता उनसे छीनी नहीं गई, बल्कि उन्होंने स्वयं मंच छोड़ने का फैसला किया है। यही कारण है कि यह बदलाव राजनीतिक से अधिक भावनात्मक प्रतीत हो रहा है। उनकी इच्छा के बिना बिहार की सत्ता उनसे छीन पाना कभी आसान नहीं रहा।

वो लंबी बैठकें अब याद आएंगी

विधानसभा के गलियारों में गूंजती उनकी आवाज, पत्रकारों से सहज संवाद और अधिकारियों के साथ उनकी लंबी समीक्षा बैठकें अब इतिहास का हिस्सा बनने जा रही हैं। जनता और फरियादियों के लिए उनकी सुलभता उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती रही।

अब आगे क्या? सबसे बड़ा सवाल

नीतीश कुमार के इस्तीफे के साथ ही बिहार की राजनीति में नए समीकरण बनने शुरू हो गए हैं। राज्य की कमान किसके हाथ में जाएगी, यह सबसे बड़ा सवाल बन गया है। राजनीतिक गलियारों में उनके पुत्र Nishant Kumar का नाम भी चर्चा में है।

हालांकि, यह केवल एक नेता का पद परिवर्तन नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति के एक पूरे युग का परिवर्तन है। जब नीतीश कुमार राज्यसभा में शपथ लेंगे, तो वे सिर्फ एक सांसद नहीं होंगे, बल्कि उस विरासत के प्रतिनिधि होंगे जिसने बिहार को नई दिशा दी।

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