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महिलाओं में मोटापा बढ़ा रहा फायब्रॉइड का जोखिम, सावधानी और बचाव जरूरी

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आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और बिगड़ती जीवनशैली महिलाओं में ‘यूट्रस फायब्रॉइड’ (गर्भाशय की गांठ) की समस्या को तेजी से बढ़ा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, अधिक वजन वाली महिलाओं में इस बीमारी का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। गर्भाशय की मांसपेशियों में होने वाली यह वृद्धि शुरुआत में कोई लक्षण नहीं दिखाती, लेकिन समय के साथ यह बांझपन, एनीमिया और किडनी में सूजन जैसी गंभीर समस्याओं का कारण बन सकती है।

क्या है यूट्रस फायब्रॉइड और इसके लक्षण?
फायब्रॉइड गर्भाशय की दीवार पर विकसित होने वाली गांठें हैं। हालांकि ज्यादातर मामलों में ये गैर-कैंसरकारी (Non-cancerous) होती हैं, लेकिन कुछ स्थितियों में ये कैंसर का रूप भी ले सकती हैं। इसके मुख्य लक्षण इसके आकार और स्थान पर निर्भर करते हैं:

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माहवारी के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव या खून के बड़े थक्के निकलना।

खून की कमी (एनीमिया) के कारण लगातार थकान और कमजोरी महसूस होना।

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बार-बार यूरिन आने की समस्या या यूरिन पास करने में दिक्कत।

पेट के निचले हिस्से में भारीपन और तेज दर्द।

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क्यों होता है फायब्रॉइड?
हार्मोनल असंतुलन, विशेष रूप से ‘एस्ट्रोजन’ हार्मोन का अधिक स्राव इसकी मुख्य वजह है। अधिक वजन, बढ़ती उम्र (40 के पार) और लंबे समय तक गर्भनिरोधक दवाओं का सेवन इस खतरे को कई गुना बढ़ा देता है। गर्भावस्था के दौरान यदि फायब्रॉइड हो, तो गर्भपात (Miscarriage) या शिशु की स्थिति बदलने का जोखिम बना रहता है।

आयुर्वेद और एलोपैथी में इलाज के विकल्प
सर्जरी: यदि महिला गर्भधारण करना चाहती है, तो केवल गांठ को निकाला जाता है। गंभीर मामलों में गर्भाशय (Uterus) को पूरी तरह हटाना ही विकल्प बचता है।

आयुर्वेद: आयुर्वेद में गांठ के आकार को बढ़ने से रोकने के लिए विशेष डाइट चार्ट का पालन किया जाता है, जिसमें जौ का दलिया, सत्तू, शाली चावल और गुलाब की पंखुड़ियाँ शामिल हैं। इसके अलावा ‘वमन’ और ‘विरेचन’ जैसी शोधन चिकित्सा भी प्रभावी है।

इमरजेंसी: अत्यधिक ब्लीडिंग की स्थिति में हेमामिलिस जैसी दवाएं डॉक्टर की सलाह पर दी जाती हैं।

सावधानी: विशेषज्ञों का कहना है कि लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज करना जानलेवा हो सकता है। समय पर सोनोग्राफी और सही उपचार से इस जटिलता से बचा जा सकता है।

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