बंगाल चुनाव की मतगणना से पहले TMC को बड़ा झटका, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के काम में दखल देने से किया इनकार

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मतगणना पर्यवेक्षकों की नियुक्ति को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए साफ कर दिया है कि भारतीय चुनाव आयोग को अधिकारियों के चयन और तैनाती का पूर्ण संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

TMC को कानूनी झटका

इस मामले में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पैरवी की। उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कई अहम दलीलें दीं।

कपिल सिब्बल की मुख्य दलीलें

  • जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) को नोटिस 13 अप्रैल को जारी हुआ, लेकिन जानकारी 29 अप्रैल को दी गई
  • हर बूथ पर गड़बड़ी की आशंका का आधार स्पष्ट नहीं
  • पहले से मौजूद माइक्रो ऑब्जर्वर के बावजूद अतिरिक्त पर्यवेक्षकों की जरूरत पर सवाल
  • राज्य सरकार द्वारा नामित अधिकारियों की अनदेखी का आरोप

सिब्बल ने यह भी कहा कि आयोग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसे हर बूथ पर अनियमितता की आशंका कैसे हुई और उसने केंद्र से अधिकारियों की नियुक्ति पहले क्यों नहीं बताई।

कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिकारियों की नियुक्ति के मामले में राजनीतिक दलों की सहमति जरूरी नहीं है। कोर्ट ने माना कि चुनाव की निष्पक्षता सुनिश्चित करना चुनाव आयोग का विशेषाधिकार है।

राजनीति पर असर

इस फैसले को पश्चिम बंगाल की राजनीति में अहम माना जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस पहले से ही केंद्रीय एजेंसियों के दखल का आरोप लगाती रही है।

अब सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद साफ हो गया है कि मतगणना प्रक्रिया भारतीय चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षकों की निगरानी में ही होगी।

इस फैसले के बाद TMC को आयोग के तय मानकों के अनुसार ही मतगणना प्रक्रिया में भाग लेना होगा, जिससे राज्य की सियासत में नए समीकरण बन सकते हैं।

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