भागलपुर, 16 सितंबर । भागलपुर जिले में गंगा और कोसी नदियों के जलस्तर में गिरावट के बाद विभिन्न गांवों से बाढ़ का पानी धीरे-धीरे उतरने लगा है। पानी घटने से लोगों ने राहत की सांस जरूर ली है, लेकिन बाढ़ प्रभावित इलाकों में अब नई चुनौतियां सामने आने लगी हैं। निचले इलाकों और दियारा क्षेत्र के गांवों में जलजमाव, कीचड़, गंदगी और दुर्गंध ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
सालों की मेहनत से बनाए गए घर जब बाढ़ के पानी से बाहर निकल रहे हैं, तो वहां तबाही के निशान, मोटी सिल्ट और गंदगी दिखाई दे रही है। ग्रामीण घर लौटना चाहते हैं, लेकिन कई स्थानों पर अभी रहने लायक स्थिति नहीं बन पाई है। प्रभावित लोगों का कहना है कि घरों की सफाई और उन्हें रहने योग्य बनाने में 15 से 20 दिन तक का समय लग सकता है।
नाथनगर से सबौर तक दर्जनों गांव प्रभावित
नाथनगर, सुल्तानगंज, रंगरा चौक और सबौर प्रखंड के दर्जनों गांव बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित रहे हैं। कोसी नदी के दबाव के कारण रेलवे लाइन तटबंध टूटने से कई गांवों में बड़ी मात्रा में पानी घुस गया था। अब जलस्तर कम होने के साथ पानी तो निकल रहा है, लेकिन गांवों की गलियां दलदल में तब्दील हो गई हैं।
नाथनगर दियारा क्षेत्र में सैकड़ों लोग अब भी छतों या ऊंचे टीन शेड वाले स्थानों पर शरण लिए हुए हैं। कई घरों के भीतर घुटनों तक कीचड़ जमा है, जिससे लोग वहां लौटने से डर रहे हैं।
पांच लोगों की डूबने से मौत का दर्द अभी ताजा
बाढ़ के दौरान बाईपास थाना क्षेत्र के कोयली खुटाहा गांव में एक ही परिवार के सदस्यों सहित पांच लोगों के डूबने की दर्दनाक घटना हुई थी। पानी घटने के बाद भी इस घटना का दर्द ग्रामीणों के बीच बना हुआ है। आपदा के दौरान हुई इस त्रासदी ने प्रभावित परिवारों के सामने बाढ़ की भयावहता को और गहरा कर दिया है।
फसल बर्बाद, रबी की बुवाई को लेकर चिंता
बाढ़ ने किसानों की कमर तोड़ दी है। धान, मक्का और सब्जियों की फसलें बड़े पैमाने पर बर्बाद हो गई हैं। कई खेतों में अब भी कई फीट पानी जमा है। ऐसे में किसानों को आने वाली रबी फसल की बुवाई की चिंता सताने लगी है।
लंबे समय तक खेतों में पानी जमा रहने से मिट्टी की स्थिति और खेती की तैयारियों पर भी असर पड़ने की आशंका है। किसानों के सामने फसल नुकसान के साथ अगली फसल के लिए बीज, खाद और संसाधन जुटाने की चुनौती भी है।

मवेशियों के चारे का संकट, मजदूरों के सामने रोजी का सवाल
बाढ़ प्रभावित गांवों में मवेशियों के लिए चारे का गंभीर संकट पैदा हो गया है। पानी और कीचड़ के कारण हरे चारे की उपलब्धता प्रभावित हुई है। वहीं, ग्रामीण इलाकों में कामकाज ठप होने से दैनिक मजदूरों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
बाढ़ का पानी उतरने के बावजूद गांवों में सामान्य रोजगार व्यवस्था बहाल नहीं हो पाई है। इससे प्रभावित परिवारों के लिए आने वाले दिन भी चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं।
पानी उतरते ही बढ़ा बीमारी और मच्छरों का खतरा
बाढ़ के बाद जलजनित बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है। प्रभावित क्षेत्रों में डायरिया, त्वचा संबंधी रोग और मलेरिया जैसी बीमारियों की आशंका के बीच मच्छरों का प्रकोप बढ़ गया है।
जिला प्रशासन की ओर से प्रभावित इलाकों में ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव और स्वास्थ्य शिविर लगाए जा रहे हैं। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में दवाइयों की मांग अभी भी अधिक बनी हुई है।
दूषित चापाकलों से पेयजल संकट
बाढ़ के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकांश चापाकल दूषित हो गए हैं। ऐसे में प्रभावित परिवारों को शुद्ध पेयजल के लिए प्रशासन और स्वयंसेवकों की ओर से उपलब्ध कराए जा रहे पानी के जार तथा हैलोजन टैबलेट पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
पानी उतरने के बाद चापाकलों की सफाई और पेयजल स्रोतों को दोबारा सुरक्षित बनाना भी प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती है।
सामुदायिक रसोई से मिल रहा दो वक्त का भोजन
जिला प्रशासन की ओर से प्रभावित क्षेत्रों में सामुदायिक रसोई का संचालन लगातार किया जा रहा है। इन रसोई के माध्यम से बाढ़ प्रभावित लोगों को दो वक्त का भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है।
राहत शिविरों में दूध, भोजन और मवेशियों के चारे की भी व्यवस्था की गई है। प्रशासन की ओर से प्रभावित परिवारों की जरूरतों के अनुसार राहत सामग्री उपलब्ध कराने का प्रयास जारी है।
बच्चों के लिए राहत शिविरों में रचनात्मक गतिविधियां
राहत शिविरों में बच्चों को आपदा के तनाव से दूर रखने के लिए पढ़ाई और मनोरंजन से जुड़ी गतिविधियां आयोजित की जा रही हैं। बरारी पॉलिटेक्निक कॉलेज स्थित राहत शिविर में बच्चों के लिए खेल-खेल में पढ़ाई और मंजूषा कला जैसी रचनात्मक गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है।
इसका उद्देश्य बच्चों को बाढ़ की भयावह परिस्थितियों के बीच सामान्य माहौल देने और उनकी पढ़ाई का सिलसिला बनाए रखने का प्रयास करना है।
1.16 लाख से अधिक परिवारों को 7 हजार रुपये की अंतरिम राहत
राज्य सरकार के निर्देश पर भागलपुर के 1.16 लाख से अधिक बाढ़ पीड़ित परिवारों के खातों में 7,000 रुपये की अंतरिम राहत राशि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के माध्यम से भेजी जा रही है। प्रभावित परिवारों को तत्काल आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए यह राशि दी जा रही है।
एनडीआरएफ-एसडीआरएफ की टीमें अब भी सक्रिय
दियारा इलाकों में एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें अब भी गश्त कर रही हैं। प्रशासन की ओर से संवेदनशील इलाकों पर नजर रखी जा रही है। जिलाधिकारी अलंकृता पांडेय और प्रभारी मंत्री नीतीश मिश्रा भी प्रभावित क्षेत्रों और राहत व्यवस्था की लगातार निगरानी कर रहे हैं।
नावों से सुदूर टोलों तक पहुंच रही राहत
प्रशासन के साथ स्थानीय समाजसेवी और युवा संगठन भी राहत कार्य में जुटे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से नावों के जरिए सुदूर बाढ़ प्रभावित टोलों तक पहुंचकर चूड़ा, गुड़, सत्तू, मोमबत्ती, ब्रेड, बिस्कुट और जरूरी दवाइयां वितरित की जा रही हैं।
दुर्गम इलाकों में जहां सड़क संपर्क अब भी प्रभावित है, वहां नावों के माध्यम से राहत सामग्री पहुंचाई जा रही है।
पानी उतरना राहत जरूर, लेकिन असली परीक्षा अब
बाढ़ का पानी घटना निश्चित रूप से राहत की खबर है, लेकिन प्रभावित परिवारों के लिए मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई हैं। अब घरों से कीचड़ और सिल्ट हटाने, साफ-सफाई, दूषित जलस्रोतों को सुरक्षित बनाने, महामारी से बचाव और क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत की चुनौती है।
इसके साथ ही किसानों को फसल नुकसान से उबारने, मवेशियों के लिए चारे की व्यवस्था करने और दैनिक मजदूरों के लिए रोजगार बहाल करने की जरूरत है। ऐसे में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत के साथ पुनर्वास और पुनर्निर्माण का काम भी लंबे समय तक जारी रखना होगा। पानी उतरने के बाद अब जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की असली जद्दोजहद शुरू हो गई है।






