रांची, 08 अक्टूबर। झारखंड में डीजीपी की नियुक्ति से जुड़े नियम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने उस प्रावधान पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसके तहत छह महीने से कम सेवा अवधि वाले अधिकारी को भी डीजीपी नियुक्त करने की अनुमति दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रथमदृष्टया माना है कि यह प्रावधान उसके ऐतिहासिक प्रकाश सिंह फैसले में तय कानूनी व्यवस्था से टकराता हुआ दिखाई देता है।
अदालत ने झारखंड सरकार को एक सप्ताह के भीतर नियम पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है। साथ ही स्पष्ट किया है कि यदि राज्य सरकार नियम में बदलाव नहीं करना चाहती है, तो उसे अदालत के समक्ष यह बताना होगा कि मौजूदा प्रावधान सुप्रीम कोर्ट के पहले से निर्धारित कानून के अनुरूप कैसे है।
डीजीपी नियुक्ति के नियम पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी राज्य में डीजीपी की नियुक्ति के लिए बनाए गए नियम उस कानूनी व्यवस्था के अनुरूप होने चाहिए, जिसे शीर्ष अदालत पहले ही निर्धारित कर चुकी है।
अदालत की प्राथमिक चिंता झारखंड के उस नियम को लेकर है, जिसमें कम सेवा अवधि वाले अधिकारी को भी डीजीपी पद पर नियुक्त किए जाने की गुंजाइश रखी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रथमदृष्टया इसे प्रकाश सिंह मामले में दिए गए निर्देशों के विपरीत माना है।
झारखंड सरकार को मिला एक सप्ताह का समय
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को इस प्रावधान पर दोबारा विचार करने के लिए सात दिन का समय दिया है। अदालत ने कहा कि यदि सरकार नियम में संशोधन करना उचित नहीं समझती है, तो उसे अपने रुख का कानूनी आधार और औचित्य अदालत के सामने स्पष्ट करना होगा।
इसका मतलब है कि अब राज्य सरकार को यह बताना होगा कि छह महीने से कम सेवा वाले अधिकारी की डीजीपी के रूप में नियुक्ति की अनुमति देने वाला प्रावधान सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्देशों के साथ किस तरह संगत है।
मौजूदा डीजीपी तदाशा मिश्रा को भी नोटिस
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड की मौजूदा डीजीपी तदाशा मिश्रा को भी नोटिस जारी किया है। अदालत ने यह कदम इसलिए उठाया है क्योंकि यदि छह महीने से कम सेवा अवधि वाले अधिकारी की डीजीपी नियुक्ति की अनुमति देने वाले राज्य के नियम को अदालत असंवैधानिक या कानून के विपरीत पाती है और उसे रद्द करती है, तो उसका असर तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर भी पड़ सकता है।
अदालत ने इस संभावित प्रभाव को रिकॉर्ड पर लेते हुए तदाशा मिश्रा को भी मामले में अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है।
नियुक्ति पर संभावित असर को लेकर मामला अहम
सुप्रीम कोर्ट की इस कार्रवाई के बाद मामला केवल झारखंड की डीजीपी नियुक्ति नियमावली की वैधता तक सीमित नहीं रह गया है। इसका संभावित असर राज्य की मौजूदा डीजीपी की नियुक्ति पर भी पड़ सकता है।
हालांकि, फिलहाल अदालत ने तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। अदालत ने संबंधित नियम और उसके प्रकाश सिंह फैसले के अनुरूप होने के सवाल पर राज्य से जवाब मांगा है।
सत्ता में कौन है, यह अदालत की चिंता नहीं : जस्टिस बागची
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत की चिंता यह नहीं है कि केंद्र या राज्य में सत्ता में कौन है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का बाध्यकारी संवैधानिक दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि इस अदालत द्वारा घोषित कानून को कमजोर या निष्प्रभावी न किया जाए।
अदालत की यह टिप्पणी डीजीपी नियुक्ति से जुड़े नियमों के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही पुलिस सुधार और डीजीपी की नियुक्ति को लेकर व्यापक दिशा-निर्देश जारी कर चुका है।
प्रकाश सिंह फैसले के अनुरूप नियम बनाने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देश में इस बात पर जोर दिया कि राज्यों को डीजीपी नियुक्ति के मामले में प्रकाश सिंह फैसले में तय कानूनी सिद्धांतों का पालन करना होगा।
अदालत अब यह जांचना चाहती है कि झारखंड की मौजूदा नियमावली इन सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं। यदि राज्य सरकार मौजूदा प्रावधान को बनाए रखना चाहती है, तो उसे अदालत के सामने इसका स्पष्ट कानूनी बचाव करना होगा।
अन्य राज्यों के नियमों का भी होगा अध्ययन
मामले में नियुक्त एमिकस क्यूरी (न्यायमित्र) को भी सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है। अदालत ने उन्हें अन्य राज्यों में डीजीपी की नियुक्ति से संबंधित कानूनों और नियमों का अध्ययन करने को कहा है।
इससे अदालत को विभिन्न राज्यों में लागू व्यवस्थाओं की तुलना करने में मदद मिलेगी। इसके आधार पर यह देखा जाएगा कि अलग-अलग राज्यों में डीजीपी नियुक्ति के लिए निर्धारित प्रावधान सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और घोषित कानून के अनुरूप हैं या नहीं।
अब राज्य सरकार के जवाब पर नजर
सुप्रीम कोर्ट के एक सप्ताह के निर्देश के बाद अब झारखंड सरकार के जवाब पर सबकी नजर रहेगी। सरकार के पास दो विकल्प हैं—या तो विवादित प्रावधान पर पुनर्विचार कर नियम में बदलाव करे या फिर अदालत के समक्ष यह साबित करे कि मौजूदा नियम सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी फैसलों के अनुरूप है।
वहीं, तदाशा मिश्रा को नोटिस जारी होने के बाद उनकी नियुक्ति भी इस मामले की सुनवाई के महत्वपूर्ण पहलुओं में शामिल हो गई है। नियम की वैधता और उसके संभावित प्रभाव पर सुप्रीम कोर्ट के आगे के रुख से ही तस्वीर स्पष्ट होगी।






