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हावड़ा के दो विद्वानों को बड़ी पहचान, दुर्लभ ग्रंथों को राष्ट्रपति भवन में स्थान

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कोलकाता। हावड़ा के दो विद्वानों द्वारा संकलित दुर्लभ और प्राचीन पांडुलिपियों व ग्रंथों को राष्ट्रपति भवन के नव-निर्मित ‘ग्रंथ कुटीर’ में स्थान दिया गया है। बांग्ला भाषा को ध्रुपद (क्लासिकल) भाषा का दर्जा मिलने के बाद राष्ट्रपति भवन के विशेष संग्रह में महत्वपूर्ण बांग्ला पांडुलिपियों को शामिल किया गया है।

इस संग्रह में हावड़ा निवासी डॉ. श्यामल बेरा द्वारा संकलित प्राचीन पांडुलिपियां भी शामिल हैं। ‘ग्रंथ कुटीर’ के उद्घाटन अवसर पर आमंत्रित अतिथियों में डॉ. बेरा स्वयं उपस्थित रहे। वहीं शिबपुर इंजीनियरिंग कॉलेज (वर्तमान में आईआईईएसटी) के सह-रजिस्ट्रार डॉ. विभोर दास भी उद्घाटन समारोह में शामिल हुए। उल्लेखनीय है कि दोनों विद्वान हावड़ा जिले के निवासी हैं। डॉ. श्यामल बेरा आंदुल में रहते हैं, जबकि डॉ. विभोर दास बाली क्षेत्र के निवासी हैं।

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डॉ. श्यामल बेरा ने राष्ट्रपति भवन के संग्रह हेतु लगभग 600 पृष्ठों की गरुड़ पुराण की दुर्लभ पांडुलिपि प्रदान की है। वहीं डॉ. विभोर दास ने चर्यापद और गीतांजलि की फैक्सिमिली प्रतियों के साथ कई अन्य दुष्प्राप्य ग्रंथ ‘ग्रंथ कुटीर’ को सौंपे हैं।

बताया गया कि डॉ. बेरा द्वारा प्रदान की गई गरुड़ पुराण की पांडुलिपि वर्ष 1861 में लिपिबद्ध की गई थी, हालांकि मूल ग्रंथ की रचना इससे कहीं पहले की मानी जाती है। विद्वानों के अनुसार संस्कृत में गरुड़ पुराण का रचनाकाल चौथी से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच है। बाद के काल में इस ग्रंथ की कई प्रतियां बंगाली लिपि में तैयार की गईं, जिनमें यह पांडुलिपि भी शामिल है। डॉ. बेरा के संग्रह की विष्णु पुराण की एक पांडुलिपि नालंदा विश्वविद्यालय में भी संरक्षित है। इसके अलावा, ब्रिटिश लाइब्रेरी के सहयोग से सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज़ द्वारा उनके संग्रह की 168 पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण किया जा चुका है।

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डॉ. विभोर दास ने चर्यापद और गीतांजलि की फैक्सिमिली प्रतियों के साथ कोड़ा भाषा में, बंगाली लिपि में प्रकाशित वर्णमाला की पुस्तक भी संग्रह में दी है। इस अवसर पर राष्ट्रपति द्वारा दोनों विद्वानों को सम्मानित किया गया। साथ ही ध्रुपद भाषाओं के अन्य शोधकर्ताओं और पांडुलिपि दाताओं को भी सम्मान प्रदान किया गया।

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने शुक्रवार को राष्ट्रपति भवन में ‘ग्रंथ कुटीर’ का उद्घाटन किया। यह केंद्र भारत की 11 ध्रुपद भाषाओं की साहित्यिक और बौद्धिक परंपरा को समर्पित है। यहां लगभग 2,300 पुस्तकें और 50 के करीब पांडुलिपियां संग्रहित की गई हैं।

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भारत की ध्रुपद भाषाओं में तमिल, संस्कृत, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, ओड़िया, मराठी, पालि, प्राकृत, असमिया और बंगाली शामिल हैं। अक्टूबर 2024 में मराठी, पालि, प्राकृत, असमिया और बंगाली को ध्रुपद भाषा का दर्जा दिए जाने के बाद अब कुल 11 भाषाएं इस सूची में शामिल हैं।

‘ग्रंथ कुटीर’ में संरक्षित पांडुलिपियां ताड़पत्र, कागज, वृक्ष की छाल और वस्त्र जैसे पारंपरिक माध्यमों पर हस्तलिखित हैं, जिनमें महाकाव्य, दर्शन, भाषाविज्ञान, इतिहास, प्रशासन, विज्ञान और भक्ति साहित्य से जुड़ी महत्वपूर्ण सामग्री शामिल है। इसके साथ ही यहां भारत का संविधान भी सुरक्षित रखा गया है।

यह परियोजना केंद्र व राज्य सरकारों, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, सांस्कृतिक संगठनों और व्यक्तिगत दानदाताओं के सहयोग से विकसित की गई है। शिक्षा मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय ने इस पहल को पूर्ण समर्थन दिया है, जबकि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र पांडुलिपि संरक्षण और प्रबंधन में तकनीकी सहयोग प्रदान कर रहा है।

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