झारखंड हाईकोर्ट ने भूमि मुआवजे से जुड़े छह मामलों में निचली अदालत का फैसला किया रद्द, नए सिरे से सुनवाई के आदेश

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रांची, 04 सितंबर। झारखंड हाईकोर्ट ने रामगढ़ जिले के गोला अंचल के डभातु गांव की 9.27 एकड़ जमीन के अधिग्रहण से जुड़े छह प्रथम अपील मामलों में निचली अदालत के मुआवजा निर्धारण संबंधी फैसले को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की अदालत ने मामलों को वापस संबंधित भूमि अधिग्रहण न्यायालय में भेजते हुए उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मुआवजे का नए सिरे से निर्धारण करने का निर्देश दिया है। अदालत ने निचली अदालत को आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से चार महीने के भीतर मामलों का फैसला करने को कहा है।

8,923 रुपये प्रति डिसमिल की दर पर उठाए सवाल

झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने अपने पूर्व के एक फैसले में निर्धारित 8,923 रुपये प्रति डिसमिल की दर पर मुख्य रूप से भरोसा किया था। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं किया गया कि वर्तमान मामलों में अधिग्रहित जमीन की परिस्थितियां उस पूर्व मामले की जमीन से किस प्रकार समान थीं।

इन छह अपीलों में तत्कालीन हजारीबाग और वर्तमान रामगढ़ जिले के उपायुक्त ने डभातु गांव की जमीन के मुआवजे से संबंधित भू-अर्जन (हजारीबाग) के विशेष न्यायालय के 29 फरवरी 2012 के फैसले को चुनौती दी थी।

भैरवा जलाशय परियोजना के लिए हुआ था भूमि अधिग्रहण

मामला भैरवा जलाशय परियोजना के लिए डभातु गांव की 9.27 एकड़ जमीन के अधिग्रहण से जुड़ा है। भूमि अधिग्रहण की घोषणा 20 नवंबर 2003 को की गई थी, जिसे 2 दिसंबर 2003 को जिला गजट में प्रकाशित किया गया था। इसके बाद कलेक्टर ने अधिग्रहित जमीन के लिए मुआवजे की दर निर्धारित की थी।

जमीन मालिकों ने निर्धारित मुआवजे को अपर्याप्त बताते हुए भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 18 के तहत आपत्ति दर्ज कराई थी।

जमीन मालिकों ने बाजार मूल्य अधिक होने का किया था दावा

भूमि मालिकों का कहना था कि अधिग्रहण के समय जमीन का बाजार मूल्य निर्धारित दर से काफी अधिक था। उन्होंने जमीन की भविष्य की उपयोगिता, उपजाऊपन और व्यावसायिक संभावनाओं को ध्यान में रखने की मांग की थी।

उनका दावा था कि जमीन गोला शहर से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और आसपास बाजार, रेलवे स्टेशन, अस्पताल, प्रखंड कार्यालय, पावर स्टेशन, राष्ट्रीय राजमार्ग समेत अन्य महत्वपूर्ण सुविधाएं मौजूद हैं।

2002 के भूमि सौदों के मूल्यांकन पर भी सवाल

भूमि अधिग्रहण न्यायालय ने पूर्व के एक मामले के फैसले को आधार बनाते हुए संबंधित जमीनों के लिए 8,923 रुपये प्रति डिसमिल की समान दर से मुआवजा निर्धारित किया था। राज्य सरकार ने इसी फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए दलील दी कि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन नहीं किया।

सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि जमीन मालिक अधिग्रहण के समय प्रचलित बाजार दर को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर सके थे। वहीं, जमीन मालिकों की ओर से दलील दी गई कि सरकार ने वर्ष 2002 में हुए कई भूमि सौदों में सबसे अधिक कीमत वाले सौदे को नजरअंदाज कर दिया और कम कीमत वाले सौदों के आधार पर मुआवजा निर्धारित किया।

33 भूमि सौदों का उचित विश्लेषण नहीं करने की बात

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद पाया कि निचली अदालत ने वर्ष 2002 में हुए 33 भूमि सौदों का उल्लेख तो किया, लेकिन उनके मूल्य और संबंधित जमीन के क्षेत्रफल का उचित विश्लेषण नहीं किया।

अदालत ने यह भी पाया कि राज्य सरकार की ओर से पेश किए गए महत्वपूर्ण दस्तावेजों, विशेष रूप से बिक्री चार्ट और वैल्यूएशन खतियान पर निचली अदालत ने पर्याप्त विचार नहीं किया।

दस्तावेजों की पठनीयता पर भी जताई नाराजगी

हाईकोर्ट ने निचली अदालत के रिकॉर्ड में शामिल कुछ दस्तावेजों की स्थिति पर भी नाराजगी जताई। अदालत ने पाया कि एक्सहिबिट-सी के कई पृष्ठ इतने छोटे थे कि उन्हें पढ़ना मुश्किल था। वहीं एक्सहिबिट-डी भी स्पष्ट रूप से पठनीय नहीं था।

अदालत ने कहा कि निचली अदालत से रिकॉर्ड भेजते समय ऐसे दस्तावेज उचित और पठनीय रूप में उपलब्ध कराए जाने चाहिए थे, ताकि अपीलीय अदालत उनके आधार पर प्रभावी ढंग से विचार कर सके।

चार महीने में नए सिरे से मुआवजा तय करने का निर्देश

हाईकोर्ट ने 29 फरवरी 2012 के फैसले और 15 मार्च 2012 को हस्ताक्षरित अवॉर्ड को रद्द कर दिया। मामलों को दोबारा उसी भूमि अधिग्रहण न्यायालय में भेजते हुए निर्देश दिया गया कि सभी उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद मुआवजे का नए सिरे से निर्धारण किया जाए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि निचली अदालत आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से चार महीने के भीतर सभी मामलों का निर्णय करेगी।

छह प्रथम अपीलों का किया गया निष्पादन

हाईकोर्ट ने छहों प्रथम अपीलों का निष्पादन कर दिया। हालांकि, इनमें से एक मामले में अपील आंशिक रूप से समाप्त हो चुकी थी। संबंधित मामले में एक प्रतिवादी की मृत्यु के बाद उसके संबंध में अपील 12 सितंबर 2022 के आदेश के तहत एबेट हो गई थी। उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को रिकॉर्ड पर लाने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए गए थे।

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