हूल दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने सिदो-कान्हू सहित जनजातीय वीर-वीरांगनाओं को किया नमन

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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हूल दिवस के अवसर पर देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो सहित सभी जनजातीय वीर-वीरांगनाओं को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि हूल दिवस मातृभूमि के लिए मर-मिटने वाले आदिवासी समाज के अद्भुत साहस और बलिदान का सशक्त प्रतीक है।

‘हूल दिवस आदिवासी समाज के जज्बे का प्रतीक’

प्रधानमंत्री ने मंगलवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर जारी अपने संदेश में कहा कि हूल दिवस मातृभूमि की रक्षा के लिए आदिवासी समाज के अदम्य साहस और समर्पण का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यह दिन उन महान जननायकों के संघर्ष और बलिदान की याद दिलाता है, जिन्होंने विदेशी शासन के अन्याय के खिलाफ डटकर मुकाबला किया।

सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो को श्रद्धांजलि

प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय इतिहास के इस गौरवशाली अवसर पर सिदो-कान्हू, चांद-भैरव तथा वीरांगनाओं फूलो-झानो सहित सभी जनजातीय वीर-वीरांगनाओं को आदरपूर्वक श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि जनजातीय गरिमा, स्वाभिमान और अधिकारों की रक्षा के लिए इन वीरों का संघर्ष और बलिदान आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करता रहेगा।

क्या है हूल दिवस का महत्व?

हर वर्ष 30 जून को 1855 के संथाल हूल (विद्रोह) की स्मृति में हूल दिवस मनाया जाता है। झारखंड के साहिबगंज जिले के भोगनाडीह गांव से सिदो मुर्मु और कान्हू मुर्मु के नेतृत्व में शुरू हुए इस ऐतिहासिक विद्रोह में चांद मुर्मु, भैरव मुर्मु तथा वीरांगनाओं फूलो और झानो ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

ब्रिटिश शासन और शोषण के खिलाफ था ऐतिहासिक आंदोलन

संथाल हूल को ब्रिटिश शासन, जमींदारी व्यवस्था और महाजनों के शोषण के खिलाफ आदिवासी समाज के सबसे बड़े और संगठित जनआंदोलनों में से एक माना जाता है। यह आंदोलन आज भी जनजातीय समाज के स्वाभिमान, संघर्ष और स्वतंत्रता की भावना का प्रतीक माना जाता है।

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