मुड़मा जतरा-2026 में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित हुए हेमंत सोरेन, सरना धर्मगुरु बंधन तिग्गा समेत प्रतिनिधिमंडल ने दिया न्योता

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—27 और 28 अक्टूबर को होगा ऐतिहासिक राजी पड़हा राजकीय मुड़मा जतरा, 40 पड़हा की परंपरा और आदिवासी संस्कृति का दिखेगा अनूठा संगम

रांची। झारखंड के ऐतिहासिक राजी पड़हा राजकीय मुड़मा जतरा-2026 की तैयारियां तेज हो गई हैं। आयोजन समिति ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को जतरा में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है। सोमवार को झारखंड मंत्रालय में ऐतिहासिक राजी पड़हा जतरा समिति, मुड़मा के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर उन्हें आमंत्रण पत्र सौंपा। इस अवसर पर सरना धर्मगुरु बंधन तिग्गा और केंद्रीय सरना समिति, भारत के अध्यक्ष नारायण उरांव भी उपस्थित थे। मुड़मा जतरा का आयोजन 27 और 28 अक्टूबर 2026 को किया जाएगा।

40 पड़हा की परंपरा से जुड़ा है ऐतिहासिक मुड़मा जतरा

रांची जिले के मांडर प्रखंड स्थित मुड़मा गांव में आयोजित होने वाला यह जतरा आदिवासी समाज का प्रमुख पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है। इसकी पहचान राजी पड़हा की परंपरा, जतरा खूंटा की पूजा और विभिन्न पड़हा के प्रतिनिधियों के सामूहिक जुटान से जुड़ी है। विशेष रूप से उरांव आदिवासी समाज की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।

पड़हा छोटानागपुर के उरांव समाज की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था का हिस्सा रहा है। इसमें कई गांवों के समूह शामिल होते हैं। मुड़मा जतरा में 40 पड़हा की भागीदारी की परंपरा का विशेष महत्व है। विभिन्न पड़हा के लोग अपने पारंपरिक झंडों और प्रतीकों के साथ जतरा स्थल पर जुटते हैं। इस दौरान धार्मिक अनुष्ठानों के साथ पारंपरिक नृत्य-संगीत और सामुदायिक मेल-मिलाप होता है।

जतरा खूंटा की पूजा है प्रमुख आकर्षण

मुड़मा जतरा में जतरा खूंटा को विशेष धार्मिक महत्व दिया जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, यह आदिवासी समाज की आस्था और सामुदायिक पहचान का प्रतीक है। जतरा के दौरान पारंपरिक पाहनों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पूजा-अनुष्ठान के साथ मांदर और नगाड़े की थाप पर पारंपरिक नृत्य-संगीत का आयोजन भी होता है।

इस ऐतिहासिक आयोजन में झारखंड के अलावा विभिन्न राज्यों से भी लोग पहुंचते हैं। धार्मिक गतिविधियों के साथ यह सामाजिक मेल-मिलाप और ग्रामीण व्यापार का भी अवसर प्रदान करता है। जतरा के माध्यम से आदिवासी समाज की परंपराओं, सामूहिकता और सांस्कृतिक पहचान की अभिव्यक्ति होती है।

उरांव और मुंडा समुदायों के भाईचारे से जुड़ी लोककथा

मुड़मा जतरा की शुरुआत को लेकर एक लोककथा प्रचलित है। इसके अनुसार, रोहतासगढ़ से निकलने के बाद उरांव समुदाय के लोग पलामू के रास्ते छोटानागपुर पहुंचे थे। लोककथा के मुताबिक, मुड़मा क्षेत्र में उनकी मुलाकात मुंडा समुदाय के पारंपरिक प्रमुखों से हुई थी। इसके बाद दोनों समुदायों के बीच क्षेत्र में बसने को लेकर सहमति बनी थी।

इस लोककथा को उरांव और मुंडा समुदायों के बीच सहयोग, आपसी सहमति और भाईचारे की स्मृति से जोड़कर देखा जाता है। मुड़मा जतरा इसी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक आस्था को आगे बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण आयोजन माना जाता है।

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