चुनाव नज़दीक आते ही ओली पर दबाव बढ़ा, रणनीतिक गठबंधनों की चर्चा फिर तेज

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काठमांडू। अगले माह 5 मार्च को होने वाले चुनाव में अब समय कम रह गया है जिससे नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएन-यूएमएल) पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। सितंबर में हुए जेन-जी आंदोलन के बाद पैदा हुआ राजनीतिक असर अब चुनावी परिदृश्य को स्पष्ट रूप से प्रभावित करने लगा है।

पिछले साल 8 और 9 सितंबर को हुए जेन-जी प्रदर्शनों के दौरान हुई मानवीय और भौतिक क्षति को लेकर यूएमएल लगातार आलोचना के घेरे में है। उस समय पार्टी अध्यक्ष और तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली सरकार का नेतृत्व कर रहे थे। आलोचकों का आरोप है कि ओली ने हिंसा की जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की और यही आरोप पार्टी का पीछा करता रहा है। हाल ही में ओली ने फेसबुक पोस्ट के माध्यम से जान गंवाने वाले 19 लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त की लेकिन इससे जनआक्रोश शांत नहीं हो सका।

ज्यादातर प्रमुख दलों के स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने के फैसले के बीच यूएमएल की चुनौतियां और बढ़ गई हैं। काठमांडू महानगर के पूर्व मेयर बालेन शाह का झापा-5 से चुनाव लड़ने का निर्णय ओली पर अतिरिक्त दबाव बना रहा है, क्योंकि यह क्षेत्र परंपरागत रूप से उनका गढ़ माना जाता रहा है। वहीं, यूएमएल के महासचिव शंकर पोखरेल भी दांग-2 में कड़े मुकाबले का सामना कर रहे हैं, जिससे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर खतरे की आशंका बढ़ गई है।

इसी पृष्ठभूमि में ओली ने कुछ चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्रों में सीमित चुनावी सहयोग की संभावनाएं तलाशनी शुरू कर दी हैं। नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष गगन थापा द्वारा किसी भी प्रकार के गठबंधन को स्पष्ट रूप से नकारे जाने के बाद, ओली कथित तौर पर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के साथ समन्वय की संभावनाएं टटोल रहे हैं।

उधर, एनसीपी के समन्वयक पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’ पर भी राजनीतिक दबाव दिखने लगा है। उन्होंने हाल ही में एक भावुक वीडियो संदेश जारी कर संकेत दिया कि वे प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में नहीं हैं और युवा पीढ़ी को आगे बढ़ते देखना चाहते हैं।

यूएमएल–एनसीपी संभावित समन्वय की अटकलों को तब और बल मिला जब अंतरिम सरकार ने देशभर में 80 हजार सुरक्षाकर्मी तैनात कर यह स्पष्ट कर दिया कि 5 मार्च के चुनाव स्थगित नहीं होंगे। ऐसे में ओली और प्रचंड दोनों ही अपने-अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश में जुटे नजर आ रहे हैं। ओली जहां झापा में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं, वहीं प्रचंड रुकुम पूर्व में अपेक्षाकृत सुरक्षित महसूस करने के बावजूद देशव्यापी बेहतर नतीजों के रास्ते तलाश रहे हैं।

ओली एनसीपी या राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) के साथ गठबंधन के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। 2022 के चुनावों में यूएमएल और आरपीपी के बीच सफल समन्वय देखने को मिला था, जिसमें ओली ने झापा-5 और आरपीपी अध्यक्ष राजेंद्र लिंगदेन ने झापा-3 से जीत हासिल की थी। हालांकि, लिंगदेन ने संकेत दिया है कि आरपीपी इस बार स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ेगी, जिससे ओली का रुझान एनसीपी की ओर बढ़ता दिख रहा है।

एनसीपी नेताओं ने पुष्टि की है कि ओली ने चुनावी सहयोग का प्रस्ताव रखा है, हालांकि अभी तक कोई औपचारिक निर्णय नहीं हुआ है। प्रचंड के सचिवालय का कहना है कि बातचीत केवल कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में सहयोग की संभावना तक सीमित रही है, न कि देशव्यापी गठबंधन पर। स्वयं प्रचंड ने भी साक्षात्कारों में संकेत दिया है कि रणनीतिक समन्वय से इनकार नहीं किया जा सकता।

हालांकि, एनसीपी के भीतर विरोध भी मजबूत है। वरिष्ठ नेता माधव कुमार नेपाल और भीम रावल ने चेतावनी दी है कि यूएमएल के साथ गठबंधन पार्टी को और कमजोर कर सकता है, विशेषकर जेन-जी आंदोलन को लेकर ओली के खिलाफ जन-असंतोष को देखते हुए। उनका कहना है कि जब तक ओली सार्वजनिक रूप से अपने पिछले कदमों के लिए माफी नहीं मांगते, किसी भी तरह का गठबंधन राजनीतिक रूप से नुकसानदेह होगा।

माधव नेपाल ने कहा कि फिलहाल यूएमएल के साथ किसी भी तरह के गठबंधन या समन्वय की संभावना नहीं है और सभी निर्णय आंतरिक परामर्श के जरिए लिए जा रहे हैं। भीम रावल ने भी यही रुख दोहराते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में एनसीपी यूएमएल के साथ आगे नहीं बढ़ेगी और यूएमएल नेताओं पर पार्टी को कमजोर करने के लिए अफवाहें फैलाने का आरोप लगाया।

यूएमएल के भीतर भी मतभेद दिखाई दे रहे हैं। जहां वरिष्ठ नेता सार्वजनिक रूप से गठबंधन वार्ता से इनकार कर रहे हैं, वहीं ओली के सचिवालय से जुड़े कुछ लोग स्वीकार करते हैं कि प्रचंड के साथ बातचीत हुई है। अटकलें हैं कि सीट आधारित सहयोग के तहत यूएमएल रुकुम पूर्व और अन्य क्षेत्रों में एनसीपी उम्मीदवारों का समर्थन कर सकती है, जिसके बदले एनसीपी झापा-5 में ओली और दांग-2 में पोखरेल को समर्थन दे सकती है।

यूएमएल महासचिव पोखरेल ने इन रिपोर्टों को खारिज करते हुए कहा है कि पार्टी अपनी ताकत पर ही चुनाव लड़ेगी। वहीं, यूएमएल के उपाध्यक्ष पृथ्वी सुब्बा गुरुङ ने भी एनसीपी के साथ तात्कालिक समन्वय की संभावना से इनकार किया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि देशव्यापी गठबंधन की संभावना भले ही कम हो, लेकिन यदि शीर्ष नेताओं को हार का खतरा महसूस हुआ तो सीमित सीट समायोजन संभव है। विश्लेषक श्याम श्रेष्ठ का कहना है कि इतिहास गवाह है कि जब बड़े नेता हार के कगार पर होते हैं, तो राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी अस्तित्व बचाने के लिए मतभेद भुला देते हैं, हालांकि ऐसे कदमों से जनता का भरोसा और कमजोर हो सकता है।

जेन-जी आंदोलन के बाद ओली राष्ट्रीय राजनीति की सबसे विवादास्पद शख्सियतों में से एक बनकर उभरे हैं, जिससे संभावित सहयोगी दल भी चुनावी समन्वय को लेकर सतर्क हैं। युवा मतदाताओं के पारंपरिक सत्ता संरचनाओं के खिलाफ संगठित होने के कारण पार्टियां यूएमएल के साथ जुड़ने से चुनावी प्रतिक्रिया के डर से बचती नजर आ रही हैं।

जैसे-जैसे चुनाव प्रचार तेज हो रहा है, यह देखना बाकी है कि क्या ये पर्दे के पीछे की बातचीत किसी ठोस चुनावी समझौते में बदल पाएगी या नहीं।

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