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गुरुजी शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मभूषण, पत्नी रूपी सोरेन ने नयी दिल्ली में राष्ट्रपति के हाथों ग्रहण किया सम्मान

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रांची। झारखंड आंदोलन के अमर पुरोधा, आदिवासियों के मसीहा और ‘दिशोम गुरु’ के नाम से प्रसिद्ध शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से नवाजा गया है। राष्ट्रपति भवन में मंगलवार को आयोजित विशेष अलंकरण समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनके योगदान को नमन करते हुए यह सम्मान प्रदान किया। राष्ट्रपति के हाथों यह सम्मान दिवंगत दिशोम गुरू शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन ने ग्रहण किया।

यह सम्मान उन्हें लोक कल्याण, सामाजिक न्याय और आदिवासी समाज के सशक्तीकरण के लिए किए गए ऐतिहासिक कार्यों को देखते हुए दिया गया है। उनके सम्मान की घोषणा के बाद राज्य में खुशी और गर्व का माहौल है। राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने इसे झारखंड और आदिवासी अस्मिता का ऐतिहासिक क्षण बताया है। केंद्र सरकार ने इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर उनके नाम की घोषणा की थी। गौरतलब है कि गुरुजी ने अपने लंबे राजनीतिक और सामाजिक जीवन में झारखंड अलग राज्य आंदोलन को धार देने के साथ ही वंचित वर्गों की आवाज को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया।

जल-जंगल-जमीन को बनाया संघर्ष का मूल आधार

जनजातीय समाज, गरीबों और वंचित वर्गों की आवाज बने शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को वर्तमान रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था। 81 वर्ष की उम्र में 4 अगस्त 2025 को उनका निधन हुआ। वे झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक नेताओं में से एक रहे और तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। शिबू सोरेन ने बचपन से ही आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार, जमींदारी शोषण और विस्थापन को बहुत नजदीक से देखा। यही अनुभव उनके जीवन की दिशा तय करने वाला बना। युवा अवस्था में ही वे आदिवासी अधिकार आंदोलन से जुड़े और जल्द ही एक जुझारू नेता के रूप में उभरे।

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सन 1970 में धान काटो आंदोलन के जरिए उन्होंने महाजनों-जमींदारों के खिलाफ मोर्चा खोला। गरीब और आदिवासियों की जमीन हड़पने वालों के खेतों की फसल सामूहिक ताकत से कटवाई। वहीं 1980 के दशक में जब खनन, उद्योग और वन कानूनों के नाम पर आदिवासियों की जमीन छीनी जा रही थी, तब उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित किया। जल, जंगल, जमीन को आदिवासी अस्तित्व का मूल आधार बताया। झामुमो के माध्यम से उन्होंने अलग झारखंड राज्य की मांग को संगठित राजनीतिक आंदोलन का रूप दिया। 1990 के दशक में उन्होंने संसद में सवाल उठाया कि खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्र के आदिवासी गरीब क्यों है? दशकों संघर्ष के बाद 15 नवंबर 2000 को झारखंड बना।

राष्ट्रपति भवन में गूंजी गुरुजी की अमर गाथा
राष्ट्रपति भवन में जब पद्मभूषण पुरस्कार के लिए दिशोम गुरु शिबू सोरेन का नाम पुकारा गया, तो पूरा हॉल एक नि:शब्द सम्मान और गौरव से भर उठा। अपने हमसफर के त्याग और करोड़ों आदिवासियों के संघर्ष की प्रतीक बनकर पहुंचीं रूपी सोरेन ने जब यह पुरस्कार ग्रहण किया, तो ऐसा लगा मानो रामगढ़ के नेमरा गांव की पगडंडियों से शुरू हुआ एक ऐतिहासिक सफर आज देश के सबसे सर्वोच्च शिखर पर विश्राम पा रहा था। इस ऐतिहासिक और गौरवशाली पल का गवाह बनने के लिए कल्पना सोरेन समेत परिवार के अन्य सदस्य भी राष्ट्रपति भवन में मौजूद थे।

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