पटना, 17 अक्टूबर । बिहार में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत ‘सुधा सखी’ पहल ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार के नए अवसर खोल रही है। जीविका से जुड़ी महिलाएं अपने घर के पास सुधा बिक्री केंद्र संचालित कर परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के साथ आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रही हैं। कभी स्वयं सहायता समूह में महज 10 रुपये की बचत से शुरुआत करने वाली महिलाएं आज अपनी दुकान संभाल रही हैं और आमदनी अर्जित कर रही हैं।
जहानाबाद की हीरामणि देवी और किशनगंज की रेशमा कुमारी की कहानियां इस बदलाव की तस्वीर पेश करती हैं। हीरामणि देवी ने स्वयं सहायता समूह में छोटी-छोटी बचत से सफर शुरू किया, जबकि रेशमा कुमारी को ऑनलाइन आवेदन के बाद लॉटरी के माध्यम से सुधा बिक्री केंद्र मिला। दोनों के अनुभव बताते हैं कि अवसर और सहयोग मिलने पर ग्रामीण महिलाएं भी स्वरोजगार के क्षेत्र में आगे बढ़ सकती हैं।
10 रुपये की बचत से शुरू हुआ हीरामणि देवी का सफर
जहानाबाद जिले की अमैन पंचायत के शाहपुर गांव की रहने वाली हीरामणि देवी गंगा जीविका स्वयं सहायता समूह की सदस्य हैं। उन्होंने समूह में महज 10 रुपये जमा करके बचत की शुरुआत की थी। धीरे-धीरे जीविका से जुड़ाव उनके लिए स्वरोजगार का रास्ता बन गया।
अपनी खुशी साझा करते हुए हीरामणि देवी कहती हैं, “हमने समूह में 10 रुपये जमा करने से शुरुआत की थी। आज जीविका के माध्यम से मुझे सुधा दूध और अन्य सामानों की दुकान मिली है। इतनी उम्र में मुझे यह रोजगार मिला है, जिससे मैं घर-परिवार की देखभाल करते हुए भी दुकान से अच्छी कमाई कर पा रही हूं।”
हीरामणि देवी की कहानी बताती है कि स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने पर उनके लिए रोजगार के नए रास्ते खुल सकते हैं। दुकान का संचालन उन्हें परिवार की जिम्मेदारियों के साथ आमदनी अर्जित करने का अवसर दे रहा है। इससे उनकी आर्थिक भागीदारी और आत्मविश्वास को भी मजबूती मिल रही है।
ऑनलाइन आवेदन के बाद लॉटरी से रेशमा को मिली दुकान
किशनगंज जिले के बेलवा की रहने वाली रेशमा कुमारी भी जीविका सुधा बिक्री केंद्र के माध्यम से स्वरोजगार से जुड़ी हैं। दुल्हन जीविका स्वयं सहायता समूह की सदस्य रेशमा ने केंद्र खोलने के लिए ऑनलाइन आवेदन किया था। इसके बाद लॉटरी के माध्यम से उनका चयन हुआ और उन्हें अपना बिक्री केंद्र शुरू करने का अवसर मिला।
रेशमा कुमारी बताती हैं, “मैंने जीविका सुधा बिक्री केंद्र के लिए ऑनलाइन आवेदन किया था और फिर लॉटरी के माध्यम से मुझे यह केंद्र मिल गया। सबसे अच्छी बात यह है कि मैंने अपने घर के पास ही यह दुकान खोली है।”
घर के नजदीक रोजगार मिलने से महिलाओं को घरेलू जिम्मेदारियों और काम के बीच तालमेल बनाने में सहूलियत मिल सकती है। रेशमा के लिए यह केंद्र कमाई का साधन होने के साथ अपने पैरों पर खड़े होने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।
जहानाबाद की 88 में से 83 पंचायतों में बिक्री केंद्र
योजना के क्रियान्वयन को लेकर जहानाबाद जिले में भी काम किया जा रहा है। जीविका के जिला परियोजना प्रबंधक (डीपीएम) विनय कुमार सिंह के अनुसार, सुधा यानी कॉम्फेड के सहयोग से जीविका दीदियों को बिक्री केंद्र खोलने का अवसर दिया जा रहा है।
विनय कुमार सिंह बताते हैं, “मुख्यमंत्री के द्वारा जीविका दीदियों के स्वरोजगार के लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण योजना चलाई गई है। इसके तहत सुधा (कॉम्फेड) के साथ मिलकर जीविका दीदियों को सुधा बिक्री केंद्र खोलने का अवसर दिया जा रहा है। हमारे जिले में कुल 88 पंचायत हैं, जिनमें से 83 पंचायतों में हमने सुधा बिक्री केंद्र के लिए दीदियों का चयन कर लिया है और उनका केंद्र चलाया जा रहा है। हीरामणि देवी का केंद्र भी इसी योजना का एक सफल हिस्सा है।”
जिले की 88 में से 83 पंचायतों में बिक्री केंद्रों के संचालन की जानकारी इस पहल के स्थानीय स्तर पर विस्तार को दर्शाती है। इससे ग्रामीण महिलाओं को व्यवसाय शुरू करने का अवसर मिलने के साथ गांवों में सुधा उत्पादों की उपलब्धता बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।
राज्य की 8,053 ग्राम पंचायतों में केंद्र खोलने का लक्ष्य
राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत 8,053 ग्राम पंचायतों में जीविका सुधा बिक्री केंद्र स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ना और गांवों में दूध तथा अन्य सुधा उत्पादों की पहुंच बढ़ाना है।
योजना के तहत एक बिक्री केंद्र स्थापित करने के लिए कुल 75 हजार रुपये के निवेश का प्रावधान बताया गया है। इसमें सरकार की ओर से 60 हजार रुपये की सहायता राशि दी जाती है, जबकि महिला लाभार्थी को 15 हजार रुपये का अंशदान करना होता है।
दुकान खोलने के लिए किन सुविधाओं पर खर्च होगी राशि?
बिक्री केंद्र शुरू करने के लिए मिलने वाली सहायता राशि का इस्तेमाल जरूरी सुविधाओं की व्यवस्था में किया जाता है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- डीप फ्रीजर और विजी कूलर जैसी सुविधाएं।
- दुकान की ब्रांडिंग और पेंटिंग।
- उत्पादों के भंडारण और बिक्री की व्यवस्था।
- परिवहन से जुड़ी आवश्यकताएं।
इस वित्तीय व्यवस्था के तहत महिला लाभार्थी को पूरे निवेश का खर्च अकेले नहीं उठाना पड़ता। सरकारी सहायता से शुरुआती आर्थिक बोझ कम होता है और जीविका से जुड़ी महिलाओं को अपना व्यवसाय शुरू करने में मदद मिलती है।
कौन ले सकता है योजना का लाभ?
जीविका सुधा बिक्री केंद्र खोलने के लिए महिला का जीविका स्वयं सहायता समूह की सदस्य होना जरूरी है। इसके अलावा, संबंधित पंचायत क्षेत्र में केंद्र चलाने के लिए स्वयं की या किराये की दुकान उपलब्ध होनी चाहिए।
इच्छुक महिलाओं को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आवेदन करना होता है। रेशमा कुमारी का चयन ऑनलाइन आवेदन के बाद लॉटरी के माध्यम से हुआ था। हालांकि, आवेदन की मौजूदा समय-सीमा, चयन की विस्तृत शर्तों और जरूरी दस्तावेजों की जानकारी संबंधित जीविका कार्यालय से प्राप्त की जानी चाहिए।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की पहल
जीविका सुधा बिक्री केंद्रों का उद्देश्य केवल सुधा उत्पादों की बिक्री तक सीमित नहीं है। यह पहल ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने, स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाने और परिवार की आय में उनकी भागीदारी मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
घर के पास दुकान संचालित करने का अवसर मिलने से महिलाओं के लिए रोजगार और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना आसान हो सकता है। वहीं, गांवों में बिक्री केंद्र स्थापित होने से स्थानीय लोगों को दूध और अन्य सुधा उत्पादों की उपलब्धता में भी सुविधा मिलने की उम्मीद है।
हीरामणि देवी और रेशमा कुमारी की कहानियां दिखाती हैं कि स्वयं सहायता समूहों से जुड़ाव, बचत की आदत और स्वरोजगार के अवसर ग्रामीण महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में नए रास्ते खोल सकते हैं।






