भागलपुर शिक्षा विभाग में 98 लाख रुपये के घोटाले का आरोप, केस दर्ज कराने वाले डीपीओ पर ही शक; एचआरए में 2000% तक बढ़ोतरी का दावा

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भागलपुर। बिहार के भागलपुर जिला शिक्षा विभाग में फर्जी शिक्षिका की आईडी बनाकर सरकारी खजाने से करीब 98 लाख रुपये के कथित गबन के मामले में जांच की दिशा बदल गई है। जिस जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (डीपीओ) स्थापना शशि चंदन चौधरी ने जोगसर थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई थी, अब पुलिस जांच में उनकी भूमिका भी संदेह के घेरे में बताई जा रही है। मामले में संविदा ऑपरेटर अविनाश राज और डीपीओ को हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, खबर लिखे जाने तक पुलिस की ओर से गिरफ्तारी की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई थी।

फर्जी शिक्षिका की आईडी से 98 लाख रुपये के लेनदेन का आरोप

मामले के अनुसार, शिक्षा विभाग के वेतन भुगतान पोर्टल पर ‘तनुश्री’ नाम से एक कथित फर्जी विशिष्ट शिक्षिका की आईडी बनाई गई थी। आरोप है कि इस आईडी के जरिए सरकारी खाते से लगभग 98 लाख रुपये की निकासी की गई। डीपीओ स्थापना शशि चंदन चौधरी ने पहले संविदा ऑपरेटर अविनाश राज, उसकी पत्नी काजल और संचिका प्रभारी शिशिर झा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी।

अब पुलिस और तकनीकी जांच में डीपीओ की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, पुलिस की विशेष टीम ने देर रात बांका जिले के शंभूगंज से संविदा ऑपरेटर अविनाश राज और भागलपुर से डीपीओ शशि चंदन चौधरी को हिरासत में लिया है। हालांकि, संबंधित पुलिस अधिकारियों ने फिलहाल गिरफ्तारी की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

एचआरएमएस पोर्टल की मंजूरी प्रक्रिया जांच के दायरे में

विभागीय सूत्रों के अनुसार, शिक्षा विभाग के एचआरएमएस पोर्टल पर वेतन और भत्तों से संबंधित बदलाव एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत किए जाते हैं। इसमें संचिका प्रभारी यानी मेकर द्वारा विवरण दर्ज किए जाने के बाद जांच और अंतिम डिजिटल मंजूरी की व्यवस्था होती है।

जांच का प्रमुख बिंदु यह है कि कथित फर्जी आईडी बनाने और भत्तों में बदलाव के लिए किन लॉगिन आईडी का इस्तेमाल किया गया। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि संबंधित प्रविष्टियों को किसने दर्ज किया, किस स्तर पर उन्हें मंजूरी मिली और डिजिटल हस्ताक्षर का इस्तेमाल किसने किया।

अप्रैल 2025 से चल रहा था कथित खेल

प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, कथित गड़बड़ी अप्रैल 2025 से शुरू हुई थी। ‘तनुश्री’ नाम की आईडी में कथित तौर पर जाली पैन कार्ड, फर्जी स्थायी सेवानिवृत्ति खाता संख्या (पीआरएएन) और एक जनधन बैंक खाते का इस्तेमाल किया गया।

आरोप है कि शुरुआत में इस आईडी के माध्यम से सामान्य वेतन के रूप में करीब सात लाख रुपये की निकासी की गई। इसके बाद पोर्टल पर उपलब्ध संपादन विकल्प का इस्तेमाल कर वेतन और भत्तों के विवरण में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए। इसी प्रक्रिया के जरिए कुल लेनदेन करीब 98 लाख रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया है।

मकान किराया भत्ते में 2000 प्रतिशत तक बढ़ोतरी का आरोप

इस मामले में सबसे गंभीर आरोप मकान किराया भत्ता यानी एचआरए में कथित हेरफेर को लेकर है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, फर्जी आईडी में एचआरए को मूल वेतन का करीब 2000 प्रतिशत तक बढ़ा दिया गया था।

खबर में दिए गए विवरण के मुताबिक, पटना जैसे ‘वाई’ श्रेणी के शहर में भी मकान किराया भत्ते की अधिकतम दर 20 प्रतिशत बताई गई है। ऐसे में कथित तौर पर 2000 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी ने भुगतान प्रणाली और मंजूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वास्तविक भुगतान विवरण और नियमों के उल्लंघन की पुष्टि जांच रिपोर्ट से होनी बाकी है।

हरियाणा से भागलपुर तक खंगाला जा रहा वित्तीय लेनदेन

पुलिस जांच में सामने आए कथित वित्तीय लेनदेन के अनुसार, सरकारी खाते से निकाली गई रकम पहले हरियाणा के फरीदाबाद स्थित एक बैंक खाते में भेजी गई। बताया जा रहा है कि इस खाते से अविनाश राज के रिश्तेदारों का संबंध है। इसके बाद राशि को भागलपुर वापस भेजे जाने की बात सामने आई है।

जांच में यूपीआई के जरिए ऑपरेटर अविनाश की पत्नी काजल और गौतम कुमार नाम के एक अन्य युवक के खातों में लेनदेन की जानकारी भी सामने आई है। आरोप है कि इस रकम से स्थानीय ऑटोमोबाइल एजेंसी से एक चौपहिया वाहन खरीदा गया और एटीएम के माध्यम से बड़ी मात्रा में नकदी निकाली गई।

पुलिस अब बैंक खातों, यूपीआई लेनदेन, वाहन खरीद और नकदी निकासी से जुड़े दस्तावेजों के आधार पर रकम के पूरे प्रवाह का पता लगाने में जुटी है।

काम से हटाए जाने के बाद भी लेनदेन जारी रहने पर सवाल

इस मामले में विभागीय व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। जानकारी के अनुसार, विभाग ने कथित तौर पर जून 2026 में संविदा ऑपरेटर अविनाश राज को काम से हटा दिया था। इसके बावजूद उसी सिस्टम और आईडी से लाखों रुपये के लेनदेन जारी रहने का दावा किया गया है।

अब जांच में यह पता लगाया जा रहा है कि काम से हटाए जाने के बाद भी ऑपरेटर के पास लॉगिन विवरण कैसे उपलब्ध रहे। साथ ही, संबंधित आईडी को तत्काल निष्क्रिय क्यों नहीं किया गया और भुगतान प्रक्रिया की निगरानी किस स्तर पर हो रही थी।

46 लाख रुपये होल्ड, शिक्षा कार्यालय से फाइलें गायब मिलने की सूचना

एचआरएमएस पटना की टीम द्वारा कथित गबन का मामला पकड़ने के बाद विभाग ने बैंक खाते में मौजूद करीब 46 लाख रुपये होल्ड कराए। इसके बाद जोगसर थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई।

गुरुवार को साक्ष्य जुटाने जिला शिक्षा कार्यालय पहुंची पुलिस को संबंधित मामले की कुछ महत्वपूर्ण संचिकाएं नहीं मिलने की जानकारी भी सामने आई है। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि फाइलें कहां हैं और क्या उनके गायब होने का मामले की जांच से कोई संबंध है।

कंप्यूटर और डिजिटल साक्ष्यों की फॉरेंसिक जांच

पुलिस अब डीपीओ कार्यालय के कंप्यूटर का आईपी एड्रेस, लॉगिन का समय, पोर्टल पर किए गए बदलाव, मंजूरी से जुड़े रिकॉर्ड और डिजिटल हस्ताक्षर का फॉरेंसिक विश्लेषण कर रही है। इन तकनीकी साक्ष्यों से यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि कथित फर्जी आईडी किसने बनाई और भुगतान में बदलाव किस स्तर पर मंजूर हुए।

जांच के दौरान यह भी पता लगाया जा रहा है कि कहीं ‘तनुश्री’ के अलावा अन्य फर्जी आईडी बनाकर भी सरकारी राशि का भुगतान तो नहीं किया गया।

वादी की भूमिका पर उठे सवालों के बीच जांच का दायरा बढ़ गया है। हालांकि, डीपीओ और अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि पुलिस जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।

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