पटना, 12 सितंबर । पटना हाईकोर्ट ने बिहार में 81 आयुध (आर्मरर) सिपाहियों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया को करीब 11 साल तक चुनौती नहीं दी गई और दूसरे मामले में फैसला आने के बाद याचिकाकर्ता अदालत पहुंचे। इतनी लंबी देरी के बाद ऐसे मामलों में राहत नहीं दी जा सकती।
जस्टिस रितेश कुमार की एकलपीठ ने प्रदीप राम एवं अन्य की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई के बाद उन्हें खारिज कर दिया।
2014 में 181 आयुध सिपाही पदों पर हुई थी परीक्षा
मामले के अनुसार, वर्ष 2014 में आर्मरर सिपाही के 181 पदों पर नियुक्ति के लिए लिखित परीक्षा आयोजित की गई थी। इसमें 213 अभ्यर्थी शामिल हुए थे। रोस्टर के आधार पर 132 अभ्यर्थियों का चयन किया गया, जबकि 81 अभ्यर्थी रोस्टर क्लीयरेंस के कारण नियुक्ति से बाहर रह गए।
इसके बाद बिहार पुलिस मेन्स एसोसिएशन की ओर से आपत्ति जताई गई। मामले में बिहार के तत्कालीन डीजीपी ने गृह विभाग से मार्गदर्शन मांगा था।
गृह विभाग ने कहा- रोस्टर क्लीयरेंस की जरूरत नहीं
गृह विभाग ने पत्र संख्या 1550 जारी कर स्पष्ट किया कि संबंधित नियुक्ति सीधी नियुक्ति या प्रोन्नति नहीं है। इसलिए इसमें रोस्टर क्लीयरेंस की आवश्यकता नहीं है।
इसके बाद शेष 81 अभ्यर्थियों की भी नियुक्ति कर दी गई और उनकी वरीयता सूची जारी की गई।
याचिकाकर्ताओं ने दूसरे मामले के फैसले का दिया हवाला
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में आर्मरर चयन में रोस्टर लागू होने की बात कही थी और 231 अभ्यर्थियों का चयन रद्द किया गया था।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उसी सिद्धांत को उनके मामले में भी लागू किया जाना चाहिए और 81 आयुध सिपाहियों की नियुक्ति को रद्द किया जाना चाहिए।
सरकार ने कहा- प्रभावित सिपाहियों को पक्षकार नहीं बनाया गया
राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि नियुक्ति से जुड़े 81 आयुध सिपाहियों में से किसी को भी मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया है। सरकार ने कहा कि याचिका पर होने वाले फैसले का सीधा असर इन कर्मचारियों की नौकरी पर पड़ सकता है, इसलिए उन्हें पक्षकार बनाए बिना नियुक्ति को चुनौती देना उचित नहीं है।
11 साल तक चुनौती नहीं देने पर हाईकोर्ट ने जताई आपत्ति
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मामले में अत्यधिक देरी हुई है। कोर्ट ने विलंब, लैचेज और आवश्यक पक्षकारों को शामिल नहीं किए जाने को याचिका खारिज करने का आधार माना।
अदालत ने कहा कि नियुक्ति को करीब 11 वर्षों तक चुनौती नहीं देना सहमति के रूप में माना जा सकता है। दूसरे मामले में फैसला आने के बाद इतने लंबे अंतराल के पश्चात चुनौती देने वालों को राहत देना उचित नहीं होगा।
इन्हीं आधारों पर पटना हाईकोर्ट ने 81 आयुध सिपाहियों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया।






