वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए दोनों देशों ने 14-सूत्रीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते का उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों में सुधार, होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंतिम समझौते के लिए 60 दिनों की वार्ता प्रक्रिया शुरू करना है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने इस समझौते पर वर्चुअल रूप से हस्ताक्षर किए। व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के हवाले से बताया गया कि समझौता तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है।
समझौते के प्रमुख बिंदु
14-सूत्रीय इस समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य को तत्काल खोलने, ईरान के समृद्ध यूरेनियम भंडार के प्रबंधन और चरणबद्ध तरीके से आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देने का प्रावधान शामिल है।
अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, यह समझौता ईरान की परमाणु गतिविधियों को नियंत्रित करने और उसके अनुपालन के आधार पर आर्थिक राहत देने के लिए एक स्पष्ट ढांचा प्रदान करता है।
60 दिनों की वार्ता प्रक्रिया
समझौते के तहत दोनों देश 60 दिनों के भीतर एक व्यापक और अंतिम परमाणु समझौते पर पहुंचने के लिए बातचीत करेंगे। आवश्यकता पड़ने पर इस अवधि को आपसी सहमति से बढ़ाया भी जा सकता है।
समुद्री मार्ग और सैन्य गतिविधियों पर असर
ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में अपनी संप्रभुता बनाए रखते हुए अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करने पर सहमति जताई है। इसके बदले अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी और संबंधित प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से हटाएगा।
इसके अलावा, समझौते में क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों, खासकर लेबनान से जुड़े अभियानों को तत्काल और स्थायी रूप से रोकने का भी उल्लेख किया गया है।
आर्थिक राहत और निवेश योजनाएं
समझौते के तहत ईरान को आर्थिक राहत देने, फ्रीज किए गए एसेट्स को जारी करने और तेल निर्यात में छूट देने की योजना है। साथ ही, ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए लगभग 300 अरब डॉलर के अमेरिकी समर्थित कार्यक्रम का प्रस्ताव भी शामिल है।
परमाणु कार्यक्रम पर प्रतिबद्धता
ईरान ने इस समझौते में दोहराया है कि वह परमाणु हथियार न तो विकसित करेगा और न ही हासिल करेगा। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में उसके समृद्ध यूरेनियम भंडार के भविष्य पर भी चर्चा की जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है, तो यह न केवल मध्य पूर्व में तनाव कम करेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर भी सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।






