स्वास्थ्य के अधिकार की लड़ाई

Share

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा और उसकी दिशा तेजी से बदल रही है। चिकित्सा, जो कभी सार्वजनिक दायित्व और कल्याणकारी राज्य की बुनियादी जिम्मेदारी माना जाता था, अब अधिकाधिक निजी क्षेत्र के हाथों में जाता दिख रहा है। एक ओर, सरकारी स्वास्थ्य ढांचा सीमित बजट, कम मानव संसाधन और कमजोर बुनियादी ढांचे से जूझ रहा है; दूसरी ओर, निजी अस्पतालों और कॉरपोरेट मेडिकल चेन की पहुंच और उसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। दोनों के बीच आम नागरिक, विशेषकर गरीब-ग्रामीण और हाशिए पर रहने वाले समुदाय, स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत और असमान पहुंच के बोझ तले दब रहे हैं।

इसी बदलते परिदृश्य में, यह बहस तेज हो गई है कि क्या स्वास्थ्य को न्यायसंगत और लागू करने योग्य मौलिक अधिकार बनाया जा सकेगा। यह कानूनी के साथ-साथ राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक प्रश्न भी है।

भारत में स्वास्थ्य का अधिकार अप्रत्यक्ष रूप से अनुच्छेद 21 के अंतर्गत न्यायालयों द्वारा मान्यता प्राप्त है, पर इसे अभी तक स्पष्ट रूप से स्वतंत्र मौलिक अधिकार नहीं बनाया गया है। इसका बड़ा कारण यह है कि राज्य अभी तक ऐसी बाध्यकारी जिम्मेदारी स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है जिसमें हर नागरिक को समान, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण उपचार मिल सके। भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि देश विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है, परंतु स्वास्थ्य पर होने वाला सार्वजनिक व्यय आज भी दुनिया के सबसे कम आंकड़ों में शामिल है। जब राज्य स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पर्याप्त बजट नहीं देता, तब स्वाभाविक रूप से रिक्त स्थान निजी क्षेत्र भरता है और यहीं से उत्पन्न होती है अनियंत्रित शुल्क, अनावश्यक चिकित्सा प्रक्रियाएँ और आम व्यक्ति की आर्थिक तबाही।

निजीकरण के विस्तार का दूसरा पहलू यह है कि यह केवल स्वास्थ्य सुविधाओं के संचालन तक सीमित नहीं है; यह स्वास्थ्य नीति, दवाओं की कीमतों, बीमा योजनाओं और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) की दिशा को भी प्रभावित कर रहा है। जब स्वास्थ्य एक लाभ आधारित उद्योग में बदल जाता है तब उपचार की प्रकृति, लागत, पहुंच और गुणवत्ता सभी बाज़ार के नियमों के अधीन हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य का अधिकार कागज़ पर तो हो सकता है पर धरातल पर वह व्यापक रूप से लागू नहीं हो पाता।

एक और गंभीर समस्या है क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट, 2010 का कमजोर क्रियान्वयन। जिन राज्यों में यह लागू भी है, वहाँ भी नियमन और पारदर्शिता कमजोर हैं। मरीज़ों से मनमाना शुल्क, अनावश्यक जाँच की सलाह, महंगे पैकेज और अत्यधिक दरों पर सर्जरी जैसी शिकायतें आम हैं। यह स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब मरीज़ की ओर से शिकायत या न्याय पाने की व्यवस्था कमजोर और अप्रभावी हो।

इसके साथ ही, भारत में आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर अभी भी कुल स्वास्थ्य व्यय का 40% के आसपास है। यानी मरीज़ों को अपनी जेब से भारी राशि खर्च करनी पड़ती है। आयुष्मान भारत जैसी सरकारी बीमा योजनाओं का उद्देश्य भले आर्थिक सुरक्षा देना हो, पर इनके दायरे में आने वाली प्रक्रियाएँ सीमित हैं और निजी अस्पतालों द्वारा इनका उपयोग कई बार मनमाने ढंग से किया जाता है। बीमा आधारित मॉडल ने स्वास्थ्य खर्च की समस्या को हल नहीं किया है बल्कि कई बार यह निजी क्षेत्र के लिए नया ग्राहक-स्रोत बन गया है।

स्वास्थ्य अधिकार को न्यायिक रूप से लागू करना तभी संभव है जब स्वास्थ्य क्षेत्र का ढांचा मजबूत हो। इसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को बढ़ाए। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वास्थ्य पर जीडीपी का कम-से-कम 5% खर्च होना चाहिए; जबकि भारत अभी 2% से भी कम खर्च करता है। प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत किए बिना, विशेषज्ञ डॉक्टरों, नर्सों और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ाए बिना, दवाओं और जांचों को सस्ता किए बिना और स्वास्थ्य संस्थानों में जवाबदेही मजबूत किए बिना, इस अधिकार को प्रभावी ढंग से लागू किए जाने की कोशिशें बेमानी होगी।

दवाओं की ऊँची कीमतें और दवा कंपनियों का प्रभाव, इसमें कोढ़ में खाज जैसी स्थिति पैदा करता है। लगभग 80% दवाएँ अभी भी मूल्य नियंत्रण से बाहर हैं। जब तक आवश्यक दवाओं पर सख्त मूल्य नियंत्रण नहीं होगा तथा जन औषधि प्रणाली का विस्तार नहीं होगा, गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार महंगी दवाओं के भार तले दबते रहेंगे।

साथ ही, स्वास्थ्य कर्मियों की स्थितियाँ भी इस संकट का एक महत्वपूर्ण पक्ष हैं। अस्थायी नियुक्तियाँ, कम वेतन, कार्यभार का दबाव- ये सभी कारक चिकित्सा सेवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा तभी संभव है जब सरकार मानव संसाधन में उचित निवेश करे।

स्वास्थ्य प्रणाली में सुधार लंबी अवधि का कार्य है; परंतु इसकी शुरुआत तत्काल बजट बढ़ाने, निजी अस्पतालों को सख्त नियामक दायरे में लाने, दवाओं की कीमतें नियंत्रित करने तथा प्राथमिक स्वास्थ्य ढाँचे को मजबूत करने से हो सकती है। यह मजबूत स्वस्थ ढांचा की नींव रखेगा।

यह स्वीकार करना चाहिए कि स्वास्थ्य केवल आर्थिक विकास का फल नहीं, मानव गरिमा की बुनियाद है। जब तक इस बुनियाद को समान रूप से मजबूत नहीं किया जाएगा, स्वास्थ्य का अधिकार कागज़ पर तो रहेगा पर जनता के जीवन में नहीं।

Share this article

Facebook
Twitter X
WhatsApp
Telegram
 
February 2026
M T W T F S S
 1
2345678
9101112131415
16171819202122
232425262728