बिहार के गांवों में गोबर गैस बना वरदान, गोबरधन योजना से घरों में आ रही पाइपलाइन की गैस

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  • राज्य में बायोगैस की 23 इकाइयां स्थापित, 15 पर चल रहा तेजी से काम
  • गांवों में बायोगैस को बढ़ावा देने से पर्यावरण संतुलन के लिए बना नया रास्ता, ग्रामीण आजीविका में सुधार

पटना: (एलपीजी) की समस्या की खबरों के बीच बिहार के ग्रामीण परिवारों के लिए गोबरधन योजना काफी कारगर साबित हो रही है। इस योजना के तहत स्थापित बायोगैस इकाइयों से उत्पादित गैस का उपयोग कर ग्रामीण जहां भोजना बना रहे हैं वहीं दूसरी ओर पर्यावरण संतुलन के लिए नया मार्ग प्रशस्त हुआ है।
ग्रामीण विकास विभाग की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों की साफ-सफाई के लिए महत्वपूर्ण योजना लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान (एलएसबीए) लागू की गई। इस योजना के तहत गांवों में बायोगैस इकाइयों की स्थापना कर उससे प्रचुर मात्रा में गैस का उत्पादन किया जा रहा है। आंकड़े बताते हैं कि वर्तमान में राज्य में कुल 23 इकाइयां संचालित हैं, जबकि 15 अन्य इकाइयों का निर्माण पूरा हो चुका है और इनमें पाइपलाइन फिटिंग, फीडिंग का कार्य चल रहा है।
इस मामले में विभागीय अधिकारियों का कहना है कि निर्माणाधीन बायोगैस इकाइयों का संचालन शुरू होने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में एलपीजी की समस्या को किसी हद तक खत्म किया जा सकेगा।
अधिकारियों ने बताया कि राज्यके सभी जिलों में बायोगैस इकाइयां स्थापित की गई हैं, जो पाइपलाइन के माध्यम से 35–40 आसपास के घरों के साथ-साथ कुछ स्थानों पर स्कूलों और स्थानीय संस्थानों को भी गैस उपलब्ध करा रही हैं। लगभग 2 केएलडी क्षमता वाली ये इकाइयां एक बार में करीब 2,000 किलोग्राम गोबर का प्रसंस्करण कर सकती हैं। ये न केवल स्वच्छ ईंधन प्रदान करती हैं, बल्कि पोषक तत्वों से भरपूर स्लरी भी उत्पन्न करती हैं, जिसका उपयोग तरल और ठोस जैविक उर्वरक के रूप में किया जाता है। बायोगैस इकाइयों का संचालन मुख्यतः जीविका स्वयं सहायता समूहों (एसएचजीएस) की प्रशिक्षित महिलाओं द्वारा किया जा रहा है, जिससे रोजगार के अवसर सृजित हो रहे हैं। साथ ही स्वच्छता को बढ़ावा मिल रहा है और बीमारियों का जोखिम कम हो रहा है।
स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) / लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के अंतर्गत लागू यह योजना गोबर के वैज्ञानिक प्रबंधन को सुनिश्चित करते हुए पर्यावरणीय स्वच्छता को मजबूत करती है। जिलों में, विशेषकर पशुधन-समृद्ध गांवों में, बायोगैस इकाइयां स्थापित की गई हैं, जहाँ गोबर को प्रसंस्कृत कर खाना पकाने की गैस और जैविक खाद में बदला जा रहा है। बायोगैस इकाइयों की सफलता कई जिलों में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। बेगूसराय में बरौनी-सेकेंड स्थित महिला संचालित बायोगैस संयंत्र प्रतिदिन लगभग 2 मीट्रिक टन गोबर का प्रसंस्करण करता है, जिससे स्वच्छ ईंधन उपलब्ध होने के साथ-साथ जैविक खाद के माध्यम से आय भी हो रही है। नालंदा और भोजपुर में गोबरधन इकाई कस्तूरबा बालिका आवासीय विद्यालय को बायोगैस उपलब्ध करा रही है, जिससे स्वच्छ और कुशल रसोई व्यवस्था सुनिश्चित हो रही है। इसी प्रकार गोपालगंज के जवाहर नवोदय विद्यालय में बायोगैस का उपयोग भोजन बनाने के लिए किया जा रहा है।


श्रवण कुमार , ग्रामीण विकास मंत्री ने कहा की योजना न केवल ऊर्जा संकट का समाधान कर रही है। बल्कि स्वच्छ पर्यावरण, सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देने और बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका सुधारने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। ग्रामीण विकास विभाग की ओर से लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान अंतर्गत लागू की गई गोबरधन पहल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध गोबर और कृषि अपशिष्ट को बायोगैस एवं जैविक खाद में परिवर्तित करती है। इससे ऊर्जा की जरूरतों और पर्यावरणीय चुनौतियों दोनों का समाधान हो रहा है।

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