कोलकाता। तारातला गोदाम हादसे के लगभग 72 घंटे बाद अस्पताल से घर लौट रहे घायलों की आपबीती ने समाज की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे में घायल एक श्रमिक ने दावा किया कि मलबे में दबे लोग मदद के लिए चीखते रहे, लेकिन कई लोग उन्हें बचाने के बजाय मोबाइल से रील बनाने में व्यस्त थे।
घायल मानिक चांद ने अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद अपनी दर्दनाक कहानी सुनाते हुए कहा, “मैं मलबे में दबा हुआ था। कभी ऊपर देखता, कभी नीचे। पूरी ताकत से मदद के लिए चिल्ला रहा था, लेकिन कुछ लोग मुझे बचाने की बजाय मोबाइल निकालकर रील बना रहे थे।”
“कई लोग जिंदा थे, लेकिन मदद के लिए तरसते रहे”
मानिक चांद ने बताया कि हादसे के समय उनके साथ कई दर्जन लोग मलबे के नीचे दब गए थे। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों की मौके पर ही मौत हो गई क्योंकि लोहे की भारी बीम और अन्य सामान सीधे उनके सिर पर गिरा था। वहीं कई लोग जिंदा थे और लगातार मदद के लिए पुकार रहे थे।
उन्होंने कहा, “मेरे साथ कई लोग पूरी ताकत से चिल्ला रहे थे। आसपास सैकड़ों लोग मौजूद थे, जो हमारी आवाज सुन रहे थे, लेकिन बहुत कम लोगों ने राहत और बचाव के लिए आगे आने की हिम्मत दिखाई।”
सोशल मीडिया संस्कृति पर उठे सवाल
घायल का यह बयान केवल एक दुर्घटना का दर्द नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक व्यवहार पर भी सवाल खड़ा करता है। हादसे के दौरान कुछ लोगों द्वारा राहत कार्य में हाथ बंटाने के बजाय मोबाइल से वीडियो और रील बनाने का आरोप इस बात की ओर इशारा करता है कि कई बार सोशल मीडिया की होड़ मानवीय संवेदनाओं पर भारी पड़ जाती है।
हादसे ने छोड़े कई सवाल
तारातला गोदाम हादसा पहले ही निर्माण संबंधी लापरवाही और सुरक्षा मानकों को लेकर सवालों के घेरे में है। अब घायलों के बयान ने यह बहस भी तेज कर दी है कि आपदा या दुर्घटना के समय लोगों की पहली जिम्मेदारी पीड़ितों की मदद करना होनी चाहिए, न कि उनकी पीड़ा को सोशल मीडिया सामग्री में बदलना।
यह घटना एक बार फिर समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि तकनीक और सोशल मीडिया के दौर में मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक जिम्मेदारी को किस तरह प्राथमिकता दी जानी चाहिए।






