रांची: Ranchi के सिरमटोली स्थित गोस्सनर तालाब के समीप एक संकरी गली में स्थापित प्राचीन शक्तिपीठ आज अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह स्थल सिरमटोली के सरना स्थल से भी अधिक प्राचीन है और यहां पूजा के बिना Sarhul पर्व अधूरा माना जाता है।
परंपरा के मुताबिक, सरहुल के दिन सूर्योदय से पहले यहां पाहन द्वारा विशेष अनुष्ठान किया जाता है। इस पूजा के बाद ही सरना स्थल पर मुख्य अनुष्ठान की शुरुआत होती है। इस कारण यह शक्तिपीठ धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
स्थानीय पाहन प्रकाश हंस के अनुसार, इस स्थल पर पूजा की परंपरा 1961 से भी पहले से चली आ रही है। पुराने समय में ग्रामीण अपनी पहली फसल यहां अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त करते थे। सरहुल के अवसर पर भोर में पाहन द्वारा रंगुवा मुर्गा चढ़ाने की परंपरा आज भी निभाई जाती है।
हालांकि, समय के साथ इस ऐतिहासिक स्थल का दायरा लगातार सिमटता जा रहा है। जमीन अधिग्रहण और आसपास हुए निर्माण के कारण अब इस शक्तिपीठ तक पहुंचने के लिए मात्र चार फीट चौड़ी संकरी गली ही बची है। वहीं, स्थल पर लगे पीपल के पेड़ों के बड़े हो जाने से पूजा के लिए उपलब्ध स्थान और सीमित हो गया है। वर्तमान स्थिति यह है कि मुश्किल से एक व्यक्ति के खड़े होकर पूजा करने जितनी ही जगह शेष है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि आसपास की अधिकांश जमीन अधिग्रहित हो चुकी है, जिससे इस आस्था के केंद्र पर संकट गहरा गया है। ग्रामीणों में यह मान्यता भी है कि यदि यहां पूजा नहीं की गई तो शक्तिपीठ रौद्र रूप धारण कर सकता है।
ऐसे में स्थानीय लोग इस प्राचीन धार्मिक धरोहर के संरक्षण की मांग कर रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस परंपरा और आस्था से जुड़ी रह सकें।





