– न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत का फैसला, जांच में दोषी पाए गए अभ्यर्थियों को नौकरी से बाहर रखने का निर्देश बरकरार
रांची, 06 नवंबर। झारखंड उच्च न्यायालय ने झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) की सामान्य स्नातक योग्यताधारी संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा (सीजीएल-2023), विज्ञापन संख्या 10/2023 को रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले को निरस्त कर दिया है। न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने शुक्रवार को फैसला सुनाते हुए 18 अगस्त 2026 को जारी राज्य सरकार की अधिसूचना रद्द कर दी। इस फैसले से परीक्षा में सफल करीब 1932 अभ्यर्थियों को बड़ी राहत मिली है। हालांकि, जांच में दोषी पाए गए अभ्यर्थियों को नौकरी से बाहर रखने का निर्देश बरकरार रहेगा।
जांच में दोषी पाए गए अभ्यर्थियों पर कार्रवाई जारी रहेगी
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि इस मामले में उच्चतम न्यायालय की ओर से पूर्व में जारी दिशा-निर्देश प्रभावी रहेंगे। जांच में जिन अभ्यर्थियों की संलिप्तता सामने आएगी, उन्हें नियुक्ति का लाभ नहीं मिलेगा। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार या संबंधित प्राधिकरण उच्चतम न्यायालय के निर्देशों को दरकिनार नहीं कर सकते।
अदालत के अनुसार, पूरी जांच और दोषी-निर्दोष अभ्यर्थियों की पहचान किए बिना पूरी परीक्षा रद्द करना उचित नहीं है। जिन अभ्यर्थियों की नियुक्ति हो चुकी है, उन्हें भी निर्धारित प्रक्रिया और जांच पूरी किए बिना सेवा से हटाना न्यायसंगत नहीं होगा।
पूर्व के न्यायिक आदेशों के अनुरूप नहीं था सरकार का फैसला
न्यायालय ने कहा कि परीक्षा रद्द करने का राज्य सरकार का निर्णय प्रकाश कुमार एवं अन्य के मामले में झारखंड उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय की ओर से दिए गए फैसलों के अनुरूप नहीं था। पूर्व में अदालतों ने निर्देश दिया था कि जांच के आधार पर दोषी और निर्दोष अभ्यर्थियों की पहचान की जाए तथा दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने भी पहले निर्देश दिया था कि जांच में दोषी पाए जाने वाले अभ्यर्थियों को नियुक्ति से वंचित रखा जाएगा। हाई कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में इसी व्यवस्था को प्रभावी बनाए रखने की बात कही है।
तीन अलग-अलग याचिकाओं पर आया फैसला
न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने जेएसएससी-सीजीएल की नियुक्ति प्रक्रिया रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली रमेश उरांव एवं अन्य, आकाश गौरव एवं अन्य तथा निरोज खेस एवं अन्य की अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया।
राज्य सरकार की ओर से वरीय अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने पक्ष रखा। वहीं, याचिकाकर्ताओं की ओर से वरीय अधिवक्ता राजीव रंजन, अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायण, इंद्रजीत सिन्हा और अमृतांश वत्स ने दलीलें पेश कीं।
याचिकाकर्ताओं ने पूर्व के न्यायिक आदेशों का दिया था हवाला
पूर्व की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया था कि जेएसएससी-सीजीएल का मामला पहले ही उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन रह चुका है तथा अदालतें इस संबंध में आदेश दे चुकी हैं। उन आदेशों में दोषी और निर्दोष अभ्यर्थियों की पहचान करने तथा आपराधिक जांच के निष्कर्षों के आधार पर नियुक्ति के संबंध में निर्णय लेने का निर्देश दिया गया था।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जब जांच के आधार पर दोषियों की पहचान करने की प्रक्रिया पहले से निर्धारित है, तो पूरी नियुक्ति प्रक्रिया को दोबारा रद्द करने का औचित्य नहीं था। उन्होंने सरकार के फैसले को पूर्व न्यायिक आदेशों के विपरीत बताते हुए कहा था कि आंदोलनकारी छात्रों को संतुष्ट करने के लिए परीक्षा रद्द करने का निर्णय लिया गया।
सरकार ने बड़े पैमाने पर अनियमितता और पेपर लीक का दिया था हवाला
वहीं, राज्य सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई थी कि परीक्षा में बड़े पैमाने पर अनियमितता और भ्रष्टाचार हुआ है। सरकार का आरोप था कि परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी की ओर से प्रश्नपत्र लीक होने दिया गया। एजेंसी के माध्यम से अभ्यर्थियों को नेपाल और अन्य स्थानों पर प्रश्नों के उत्तर रटवाए जाने का भी आरोप लगाया गया था।
सरकार ने कहा था कि परीक्षा की निष्पक्षता और नियुक्ति प्रक्रिया में जनता का विश्वास बनाए रखना जरूरी है। जांच के दौरान गड़बड़ी और भ्रष्टाचार से जुड़े साक्ष्य मिले हैं। सरकार के अनुसार, दोषी और निर्दोष अभ्यर्थियों को अलग-अलग करना कठिन था। इसी आधार पर कैबिनेट ने प्रश्नपत्र लीक और अन्य अनियमितताओं का हवाला देते हुए पूरी परीक्षा रद्द करने का निर्णय लिया था।
हाई कोर्ट के ताजा फैसले के बाद अब नियुक्ति प्रक्रिया पर लगी अनिश्चितता दूर होने की उम्मीद है। हालांकि, जांच में दोषी पाए जाने वाले अभ्यर्थियों के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी।






