कब है धनतेरस? जानें खरीदारी के शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और अष्टलक्ष्मी का महत्व

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पटना, 05 नवंबर। दीपावली के पांच दिवसीय पर्व की शुरुआत धनतेरस से होती है। इस दिन सोना-चांदी, बर्तन, वाहन और अन्य नई वस्तुओं की खरीदारी को शुभ माना जाता है। हालांकि, धनतेरस का महत्व केवल खरीदारी तक सीमित नहीं है। इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की पूजा-अर्चना, दीपदान और मंत्र जाप की भी विशेष परंपरा है। आइए जानते हैं धनतेरस की तिथि, खरीदारी के शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं।

6 नवंबर को मनाया जाएगा धनतेरस

इस बार धनतेरस 6 नवंबर को मनाया जाएगा। वाराणसी पंचांग के अनुसार, कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि सुबह 11:06 बजे से शुरू होगी। इस दिन खरीदारी और पूजा-पाठ के लिए शुभ समय का ध्यान रखना चाहिए।

खरीदारी के शुभ मुहूर्त

धनतेरस के दिन सुबह 10:18 बजे से 11:17 बजे तक राहुकाल रहेगा। इस दौरान खरीदारी और नए शुभ कार्यों की शुरुआत करने से बचने की मान्यता है।

सुबह 11:22 बजे से दोपहर 1:07 बजे तक खरीदारी के लिए विशेष शुभ मुहूर्त है। इस दौरान वाहन, इलेक्ट्रॉनिक सामान, जमीन और मकान खरीदने की योजना बनाई जा सकती है। वहीं, सोना, चांदी और अन्य आभूषणों की खरीदारी के लिए शाम 5:41 बजे से 7:38 बजे तक का समय शुभ बताया गया है। खरीदारी सूर्यास्त से पहले पूरी कर लेनी चाहिए, ताकि शाम का समय माता लक्ष्मी की पूजा और आराधना के लिए रखा जा सके।

पीतल के बर्तनों का विशेष महत्व

धनतेरस पर सोना-चांदी के अलावा धातु की वस्तुएं खरीदने की परंपरा है। इनमें पीतल के बर्तनों का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उनके हाथों में अमृत कलश होने के कारण इस दिन पीतल के बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है।

इसके अलावा धनतेरस पर नारियल, झाड़ू और धनिया खरीदने की भी परंपरा है। नारियल को श्रीफल कहा जाता है और इसे माता लक्ष्मी से जोड़कर देखा जाता है। वहीं, झाड़ू को लक्ष्मी का प्रतीक तथा धनिया को धन और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

खाली बर्तन घर लाना माना जाता है अशुभ

ज्योतिषाचार्य के अनुसार, धनतेरस पर धातु का कोई बर्तन खरीदने पर उसे खाली घर नहीं लाना चाहिए। खरीदे गए पात्र में धनिया या सोने-चांदी का सिक्का रखकर घर में प्रवेश करना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, समृद्धि के प्रतीक के साथ पात्र को घर लाने से शुभता आती है।

भगवान धन्वंतरि की पूजा से आरोग्य की कामना

धनतेरस को भगवान धन्वंतरि की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। उन्हें आयुर्वेद का देवता और आरोग्य का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए इस दिन उनकी पूजा का विशेष महत्व है।

धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की आराधना कर परिवार के सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की जाती है। उनका कहना है कि धन-संपत्ति होने के बावजूद यदि व्यक्ति स्वस्थ नहीं है, तो वह जीवन के दूसरे सुखों का पूरा आनंद नहीं ले सकता। इसलिए स्वास्थ्य को सबसे महत्वपूर्ण धन माना गया है।

क्या हैं अष्टलक्ष्मी के आठ स्वरूप?

धार्मिक मान्यताओं में माता लक्ष्मी के आठ स्वरूपों को अष्टलक्ष्मी कहा जाता है। ये जीवन के अलग-अलग सुख, समृद्धि, शक्ति और ऐश्वर्य का प्रतीक माने जाते हैं।

अष्टलक्ष्मी के आठ स्वरूप इस प्रकार हैं—

  1. आदि लक्ष्मी: जीवन के मूल सुख और आध्यात्मिक समृद्धि की प्रतीक।
  2. धन लक्ष्मी: धन, सोना-चांदी और आर्थिक संपन्नता प्रदान करने वाली।
  3. धान्य लक्ष्मी: अन्न, खाद्यान्न और कृषि की समृद्धि की प्रतीक।
  4. गज लक्ष्मी: राजसी वैभव, प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य से जुड़ी।
  5. संतान लक्ष्मी: संतान सुख और वंश वृद्धि की कामना से संबंधित।
  6. वीर लक्ष्मी या धैर्य लक्ष्मी: साहस, शक्ति और विपरीत परिस्थितियों में धैर्य का प्रतीक।
  7. विजय लक्ष्मी: जीवन के संघर्षों में सफलता और विजय प्रदान करने वाली।
  8. विद्या लक्ष्मी: ज्ञान, शिक्षा, बुद्धि और विवेक की प्रतीक।

अष्टलक्ष्मी की अवधारणा यह बताती है कि वास्तविक धन केवल बैंक बैलेंस, सोना-चांदी या संपत्ति तक सीमित नहीं है। इसमें परिवार का सुख, अच्छा स्वास्थ्य, ज्ञान, साहस और जीवन में संतुष्टि भी शामिल है।

धनतेरस की शाम ऐसे करें पूजा

धनतेरस की शाम माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा का विशेष विधान है। इस दिन घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई कर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर का स्मरण करना चाहिए। इसके बाद दीप जलाकर धूप, फूल, अक्षत और नैवेद्य अर्पित कर श्रद्धापूर्वक पूजा करनी चाहिए।

इस दिन भगवान कुबेर के सामने चौमुखा दीपक जलाने का विशेष महत्व है। चार मुख वाला दीपक जीवन की चारों दिशाओं में प्रकाश और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इससे जीवन में सुख-समृद्धि और बाधाओं से मुक्ति की कामना की जाती है।

कुबेर मंत्र का 108 बार करें जाप

धनतेरस पर भगवान कुबेर की साधना के लिए विशेष मंत्र

कुबेर मंत्र:
“ॐ कं कुबेराय वैश्रवणाय धनं धान्यं देहि देहि।”

इसके साथ ही माता लक्ष्मी के बीज मंत्र ‘श्रीं’ का जाप भी शुभ माना जाता है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक मंत्र जाप करने से सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य की कामना पूरी होती है।

धनतेरस पर दीपदान का भी है विशेष महत्व

धनतेरस के दिन दीपदान की परंपरा भी प्रचलित है। इस अवसर पर मिट्टी, पीतल या अन्य धातु के दीपक खरीदकर ब्राह्मण को दान करने का विधान बताया जाता है। दीपदान को जीवन से अंधकार दूर करने और प्रकाश फैलाने का प्रतीक माना जाता है।

व्यक्ति अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार एक, पांच, 11, 15 या अन्य शुभ संख्या में दीपक दान कर सकता है। इसके अलावा घर के मुख्य द्वार और पूजा स्थल पर भी दीप जलाए जाते हैं।

इस तरह धनतेरस केवल सोना-चांदी और नई वस्तुओं की खरीदारी का पर्व नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, धन, आरोग्य और पारिवारिक खुशहाली की कामना से जुड़ा त्योहार है। इस दिन भगवान धन्वंतरि से अच्छे स्वास्थ्य, माता लक्ष्मी से सुख-समृद्धि और भगवान कुबेर से धन-धान्य की कामना की जाती है।

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